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भारत-अमेरिका की दोस्ती से डरा चीन, बड़ा रहा समुद्र में अपनी ताकत, जानिए...

डॉ. संदीप कोहली,

नई दिल्ली (21 फरवरी): भारत की अमेरिका और जापान से बढ़ती दोस्ती, दक्षिण चीन सागर विवाद और वन चाइना पॉलिसी पर अमेरिका से बढ़ती तनातनी ने चीन की चिंता बढ़ा दी है। बौखलाया चीन दुनिया के सामने अपनी सैन्य शक्ति दिखाकर अपना वर्चस्व साबित करने की कोशिश कर रहा है। इसी कड़ी में उसने पहले दस न्यूक्लियर वारहेड से लेस इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल का परिक्षण किया फिर बैलिस्टिक मिसाइल के साथ सबसे बड़ी मिलिट्री ड्रिल की और अब साउथ चाइना सी पर अपने दावे को और मजबूत करने और इस क्षेत्र में अपने दखल को बढ़ाने के लिए तीसरा विमानवाहक पोत का निर्माण कर रहा है। चीन का यह कदम दक्षिण चीन सागर विवाद में तेल में घी का काम करेगा। जो जापान, ताइवान, वियतनाम, कम्बोडिया, फिलीपींस समेत कई देशों के लिए खतरा साबित होगा। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने चीनी रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी सूचनाओं के आधार पर ये खबर प्रकाशित की है। रिपोर्ट के मुताबिक इस आधुनिक विमान वाहक पोत का निर्माण शंघाई में किया जा रहा है। इस विमानवाहक पोत की सबसे खास बात है कि यह अमेरिकी मॉडल पर आधारित है। दुनिया का सबसे बड़े विमानवाहक पोत अमेरिका के ही पास हैं। चीन का पहला विमान वाहक पोत लिओनिंग सोवियत संघ के जमाने का है, दूसरे पोत का निर्माण दालियान पोर्ट में किया जा रहा है जो जलावतरण के लिए तैयार है।

चीन ने बैलिस्टिक मिसाइल के साथ की सबसे बड़ी मिलिट्री ड्रिल- चीन के सरकारी अखबार चाइना डेली में सोमवार को यह खबर छापी है साथ ही वेबसाइट पर एक वीडियो भी अपलोड किया गया है। खबर के मुताबिक इस युद्धाभ्यास में दो तरह के DF-16 बैलिस्टिक मिसाइल को दिखाया गया है। ऐसा तीसरी बार है जब सार्वजनिक तौर पर इस तरह DF-16 को दिखाया जा रहा है। सबसे पहले इस मिसाइल को सितंबर 2015 में दुनिया के सामने बीजिंग में हुई मिलिट्री परेड में दिखाया गया था। वैसे चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी PLA जो अपने हथियारों से संबंधित सूचनाओं को काफी गोपनीय रखता है। उसने दुनिया को अपनी ताकत दिखाने के लिए बैलिस्टिक मिसाइल से किए जा रहे सेना के युद्धाभ्यास का वीडियो जारी किया है।

ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से चीन दिखा रहा है आक्रामक तेवर- डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही चीन लगातार ताइवान को लेकर आक्रामकता दिखा रहा है। ताइवान के राष्ट्रपति के साथ ट्रंप की बातचीत के बाद से चीन लगातार यह रुख अपना रहा है।  ट्रंप की इस बातचीत पर आपत्ति जताते हुए चीन ने अपने फर्स्ट एयरक्राफ्ट कैरियर को ताइवान जलडमरूमध्य भेजा था।  साथ ही अपना एयरक्राफ्ट प्रशांत महासागर में स्थित फर्स्ट आइलैंड चेन में भी भेजा। इसके अलावा, चीन ने विवादित दक्षिणी चीन सागर क्षेत्र में भी नौसेना अभ्यास किया। चीन ने रूस के साथ सटी अपनी सीमा के पास एक लंबी दूरी के मिसाइल को भी तैनात किया है। रूस की मीडिया का कहना है कि इस मिसाइल का निशाना अमेरिका की ओर है।

चीनी की हिंद महासागर पर नजर...

    * चीन पाकिस्तान के जरिए हिंद महासागर में घुसपैठ कर चुका है।

    * चीन पाकिस्तान के ग्वादर में बंदरगाह विकसित कर रहा है।

    * ग्वादर तक जाने के लिए चीन हिंद महासागर का रास्ता इस्तेमाल करता है।

    * हिंद महासागर में हर तीन महीने में चार चीनी पनडुब्बियां दिखाई देती हैं।

    * पनडुब्बियां अंडमान द्वीप समूह के पास मलक्का स्ट्रेट्स में देखी गई हैं।

    * मलक्का स्ट्रेट्स को साउथ चाइना सी का इंट्री गेट माना जाता है।

    * यहीं से होकर चीन को 80 फीसदी ईंधन की सप्लाई होती है।

    * आप समझ सकते हैं कि ये रास्ता चीन के लिए कितना अहम है।

साउथ चाइना सी विवाद...

    * चीन ने 1940 के दशक में दक्षिण चीन सागर के इलाको को अपने मैप में शामिल कर लिया।

    * इसके बाद से चीन पूरे इलाके पर अपना दावा जताने लगा, वहाँ उसने सैनिक अडडे बनाए।

    * बडे पैमाने पर अतंराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर मछली पकडने का काम चलाने लगा।

    * फीलिपींस, वियतनाम, मलेशिया और ब्रूनेई जैसे देश चीन के दावे को खारिज करते रहे है।

    * 2013 में फीलिपींस इस मामले को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण में ले गया था।

    * बाद में चीन ने न्यायाधिकरण के फैसले को मानने से माना कर दिया।

    * 1982 के यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी का कहना है।

    * देशों को अपने समुद्री तटों से 200 नॉटिकल मील तक समुद्री संसाधनों की मंजूरी होगी।

    * इस संधि को चीन, वियतनाम, फिलीपीन्स और मलयेशिया सभी ने मंजूर किया है।

    * हालांकि इस संधि को अमेरिका ने मंजूर नहीं किया है इसे अमेरिकी संप्रभुता को खतरा बताया।

    * चीन का भी कहना है कि उसे एक्सक्लूसिव इकनॉमिक जोन के भीतर निगरानी करने का हक है।

साउथ चाइना सी भारत के लिए क्यो महत्वपूर्ण है...

    * माना जाता है दक्षिण चीन सागर के रास्ते सालाना 500 अरब डॉलर का व्यापार होता है।

    * यही वजह से इसकी रणनीतिक, सामरिक और आर्थिक तौर पर यह इलाका महत्वपूर्ण है।

    * यहा पर भरपूर मात्रा में तेल, गैस और खनिज होने के प्रमाण मिले है।

    * भारत का 55% समुद्री कारोबार इसी इलाके से गुजरता है।

    * यह भारत के लिए अन्तराष्ट्रीय कारोबार बढाने का अहम रास्ता है।

    * भारतीय तेल कम्पनी ONGC इस इलाके में दो तेल ब्लाक की हिस्सेदारी ले चुकी है।

    * इसके अलावा भारतीय कम्पनियां वियतनाम, कबोडिया समेत कई देशो में निवेश कर रही है।

दुनिया के सात बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर...

1- फोर्ड क्लास (अमेरिका)- सबसे ताकतवर एयरक्राफ्ट कैरियर की लिस्ट में पहले स्थान पर अमेरिका का फोर्ड क्लास विमान वाहक पोत है। यह निमित्ज क्लास के पोत का आधुनिक रूप है। 2015 में अमेरिकी नौ सेना को फोर्ड क्लास का पहला पोत मिल जाएगा। यह अब तक बने सभी विमान वाहक पोत से बड़ा और ज्यादा ताकतवर है। इसपर 85 विमान, हेलिकॉप्टर और यूएवी तैनात होंगे।

2- निमित्ज क्लास (अमेरिका)-  दूसरा सबसे ताकतवर विमान वाहक पोत अमेरिका का निमित्ज क्लास है। निमित्ज क्लास के सिर्फ दस पोत बनाए गए हैं। इनमें से 3 निमित्ज क्लास और 7 निमित्ज क्लास के उन्नत रूप हैं। यह पोत परमाणु शक्ति से चलता है। इसपर 80 विमान और हेलिकॉप्टर तैनात किए जाते हैं।

3- कुज्नेत्सोव (रूस)- रूस का कुज्नेत्सोव विमान वाहक पोत है। आकार में यह भले ही अमेरिकी पोत से छोटा हो, लेकिन यह ताकतवर हथियारों से लैस है। यह पोत अपने साथ हवा, जमीन और पानी के अंदर मार करने वाले मिसाइल और अन्य हथियार ले जाता है। इसपर 40 विमान और हेलिकॉप्टर तैनात किए जाते हैं।

4- लिओनिंग (चीन)- चीन का लिओनिंग विमान वाहक है। इस पोत को 1985 से 1988 के बीच यूक्रेन में बनाया जा रहा था, लेकिन सोवियत यूनियन से फंडिंग बंद होने के बाद पोत का निर्माण बंद हो गया। इसके बाद चीन ने इसे खरीदा और पूरा बनाया। 2012 में यह चीन की सेना में शामिल हुआ। इसपर 50 विमान और हेलिकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं।

5- क्वीन एलिजाबेथ (ब्रिटेन)- ब्रिटेन की क्वीन एलिजाबेथ विमान वाहक पोत है। 284 मीटर लंबे इस पोत पर 40 लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं। वर्तमान में क्वीन एलिजाबेथ क्लास के तीन पोत बनाए जा रहे हैं। 2009 में पहले पोत का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। इसे 2017 तक सेना को सौपा जा सकता है।

6- चार्ल्स डे गुल्ले (फ्रांस)-  फ्रांस का यह एयर क्राफ्ट कैरियर परमाणु ऊर्जा से चलता है। फ्रेंच नेवी ने 2001 से इसका इस्तेमाल शुरू किया है। वर्तमान में यह फ्रांस की नौसेना का प्रमुख जहाज है। यह न्यूक्लियर पावर से चलने वाला पहला ऐसा पोत है जो अमेरिका से बाहर बना है। इसपर 40 लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं।

7- विक्रमादित्य (भारत)- भारत का विमान वाहक पोत विक्रमादित्य है। यह हल्का एयरक्राफ्ट कैरियर है। इसे किव क्लास के एविएशन क्रूजर को मोडिफाइड कर बनाया गया है। कोल्ड वार के बाद रूस के लिए एविएशन क्रूजर को ऑपरेट करना मुश्किल हो रहा था। इसलिए उसने एक क्रूजर भारत को बेच दिया। इसे पुराने हो चुके एयर क्राफ्ट कैरियर विराट के जगह पर तैनात किया जाएगा। विक्रमादित्य पर 30 लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर तैनात किए जा सकते हैं।


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