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बच्चे कैसे बनते जा रहे हैं 'रोबोट', इसका ज़िम्मेदार कौन?

साक्षी जोशी, नई दिल्ली (3 मई) :  बच्चों की इच्छाएं पूरी करने में पेरेंट्स कोई कसर नहीं छोड़ते। अब ज़माना हाईटेक और गैजेट्स का है तो बच्चों की एक मांग अच्छे से अच्छा स्मार्टफोन पास रखने की भी होती है। हम तुरंत उसे भी पूरा कर देते हैं ये सोचे बग़ैर कि क्या बच्चे की उम्र भी है उस गैजेट को हाथ में लेने की,  उसका इस्तेमाल बेरोकटोक करने की !! दरअसल इस आपाधापी की दुनिया में बच्चों के लिए माता-पिता (खासतौर पर कामकाजी) कम ही समय निकाल पाते हैं। इसकी भरपाई वो बच्चों को उनकी मनपसंद की चीज़ें दिलवा कर करते हैं। इसे एक तरह की रिश्वत ही कह सकते हैं। यानी टाइम तो पास है नहीं, तो क्यों ना महँगी चीज़ें दिलाकर ही बच्चे को जता दिया जाए कि माता पिता उससे कितना प्यार करते हैं।

जब उनके हाथों में फ़ोन पकड़ाने वाले हम ही हैं, तो फिर क्यों हमें बुरा लगता है जब हम घर में घुसते ही बच्चों को फ़ोन में घुसे हुए देखते हैं। वो भी इस क़दर कि उन्हें हाय हेलो करना तो दूर, ये भी याद नहीं रहता कि घर में एक घंटे पहले उसकी माँ आ चुकी है जिसकी तबीयत बहुत ख़राब है। बच्चे को क्या...वो तो अपना सबसे पसंदीदा खेल फ़ोन में खेल रहा है। उसे भला माँ की फ़िक्र क्यों होने लगी? माँ के लिए फ़िक्र तब होगी जब उसे माँ की अहमियत पता चलेगी। माँ ने तो ख़ुद ही लाड़ दुलार में बच्चे की नज़र में स्मार्टफ़ोन को ज़्यादा अहम बना डाला। फ़ोन ख़राब होगा तो बच्चे के आँसू निकलेंगे लेकिन माँ का दर्द देखकर नहीं।

जो माता पिता बच्चों को फ़ोन देने के मामले में थोड़ा सख़्त हैं, देखा जाता है कि उनके बच्चे किसी काम को करने के लिए आधा घंटा उनके फ़ोन पर खेलने की शर्त लगा देते हैं। मजाल है कि बिना शर्त की हामी भरे आप उनसे कोई काम करवा पाएँ।

क्या हम अपने बच्चों को रोबोट बनाते जा रहे हैं? क्या हमारे बच्चे संवेदनहीन होते जा रहे हैं? क्या इसमें पूरा क़सूर सिर्फ़ स्मार्टफ़ोन का है? अगर ऐसा होता तो जिन बच्चों के हाथ में फ़ोन नहीं है वो बच्चे भी क्यों उसे पाने के लिए बेताब होते जा रहे हैं।

कुछ दिन पहले पोप ने भी टीनएजर्स से अपील की थी कि फ़ोन से उन्हें ख़ुशी नहीं मिलेगी। तो ख़ुशी कैसे मिलेगी? इसका जवाब सिर्फ़ माता पिता के पास है जिन्हें अब वाक़ई माता पिता बनने की ज़रूरत है।। कहाँ गए लूडो, साँप सीढ़ी, कैरम, शतरंज जैसे खेल? बाज़ार में तो ये अब भी मिलते हैं।घरों में भी बच्चों को बर्थडे गिफ़्ट में कोई बच्चा दे ही जाता है। काफ़ी सस्ते भी हैं। लेकिन जो ख़ुशी इन्हें खेलकर मिलती है वो वाक़ई अनमोल होती है।

मगर बच्चा ख़ुद से कैसे खेले। ये पारिवारिक खेल हैं। सब मिलकर साथ खेलते हैं। इस बहाने एक अच्छा मस्तीभरा समय सब साथ गुज़ारते हैं। बच्चों को आधा घंटा फ़ोन देने की बजाय उनके लिए समय निकालकर लूडो खेलने की शर्त मानोगे तो बच्चे रोबोट नहीं इंसान के बच्चे ही बनेंगे। परिवार एक दूसरे के साथ मज़बूत बंधन में बंधेगा वो अलग।


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