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CBIvsCBI: आलोक वर्मा पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, बहस हुई पूरी

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा से अधिकार वापस लेने और उन्हें छुट्टी पर भेजने के केंद्र के फैसले के खिलाफ दायर वर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रहे उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। आज इस मामले पर हुई सुनवाई में न्यायालय ने कहा कि सरकार की कार्रवाई के पीछे की भावना संस्थान का हित होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने उसे बताया है कि जिन परिस्थितियों में ये हालात पैदा हुए उनकी शुरूआत जुलाई में ही हो गई थी।

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (6 दिसंबर): सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा से अधिकार वापस लेने और उन्हें छुट्टी पर भेजने के केंद्र के फैसले के खिलाफ दायर वर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रहे उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। आज इस मामले पर हुई सुनवाई में न्यायालय ने कहा कि सरकार की कार्रवाई के पीछे की भावना संस्थान का हित होनी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने उसे बताया है कि जिन परिस्थितियों में ये हालात पैदा हुए उनकी शुरूआत जुलाई में ही हो गई थी।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने कहा, सीबीआई के दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच लड़ाई एक रात में शुरू नहीं हुई। ऐसे में सरकार ने चयन समिति से परामर्श लिए बिना कैसे सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को उनकी शक्तियों से वंचित कर दिया? न्यायमूर्ति गोगोई ने मेहता से पूछा, 'सरकार ने 23 अक्तूबर को सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा से सारी शक्तियां छीनने का रातोंरात निर्णय लेने के लिए किसने प्रेरित किया? जब वर्मा कुछ महीनों बाद सेवानिवृत्त हो रहे थे तो सरकार ने कुछ महीनों का और इंतजार क्यों नहीं किया और चयनित समिति से परामर्श क्यों नहीं लिया गया?'

महाधिवक्ता ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि सीवीसी इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि एक असाधारण स्थिति पैदा हो गई थी और असाधारण परिस्थितियों के लिए कभी-कभी असाधारण उपचार की जरूरत होती है। महाधिवक्ता ने न्यायालय को बताया, 'असाधारण परिस्थितियां उभर गई थीं। सीवीसी जांच का आदेश निष्पक्ष रूप से पारित किया गया था। दोनों वरिष्ठ अधिकारी लड़ रहे थे और गंभीर मसलों की जांच करने की बजाए एक-दूसरे के खिलाफ मामले की जांच कर रहे थे। सीवीसी की उपेक्षा करना कर्तव्य का अपमान होगा। यदि सीवीसी कार्रवाई नहीं करेगी तो वह राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय के प्रति जवाबदेह होगी।'

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने न्यायालय से कहा, 'सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को स्थानांतरित नहीं किया गया था और यह उनके द्वारा दिया गया कृत्रिम तर्क था कि उन्हें स्थानांतरित कर दिया गया। यह स्थानांतरण नहीं था बल्कि दोनों अधिकारियों को उनके कार्यों और प्रभार से वंचित कर दिया गया था।' आलोक वर्मा के वकील फली एस नरीमन ने कहा, 'सभी परिस्थितियों में उन्हें चयन समिति से परामर्श करना चाहिए था। इस मामले में स्थानांतरण का मतलब सेवा न्यायशास्र में हस्तांतरण नहीं है। हस्तांतरण का मतलब केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर होना नहीं होता है। संविधान के अनुसार जैसे भारत का मुख्य कार्यवाहक न्यायाधीश नहीं हो सकता, मुख्य न्यायधीश ही होता है ठीक वैसे ही परिस्थिति यहां है। वह कार्यवाहक मुख्य निदेशक नहीं रख सकते।'

रंजन गोगोई ने नरीमन से कहा, 'यदि कोई समस्या है तो क्या उच्चतम न्यायालय एक कार्यवाहक निदेशक को नियुक्त कर सकती है?' इसपर उन्होंने कहा, 'हां सर्वोच्च न्यायालय ऐसा कर सकती है क्योंकि संविधान का अंतिम मध्यस्थ न्यायालय है।' सीवीसी ने न्यायालय को बताया कि सीवीसी ने जांच शुरू की लेकिन सीबीआई निदेशाक आलोक वर्मा ने महीनों तक दस्तावेज नहीं दिए। विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने न्यायालय से कहा, 'निदेशक आलोक वर्मा के खिलाफ सीवीसी जांच को सरकार तर्कपूर्ण अंजाम तक लेकर जाए।' अस्थाना के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा, 'इस मामले में व्हिसल ब्लोवर रहे विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के साथ भी सरकार ने वैसा ही व्यवहार किया। 


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