News

'आर्मी मेडिकल कॉर्प्स में महिलाओं की भर्ती पर प्रैग्नेंसी के चलते रोक नहीं'

नई दिल्ली (10 फरवरी): बर्दीधारी सेवाओं में महिलाओं के अधिकारों से संबंधित मामले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि आर्मी मेडिकल कॉर्प्स (एएमसी) में एक डॉक्टर के तौर पर महिला अभ्यर्थी की भर्ती को हमेशा के लिए केवल इस आधार पर नहीं रोका जा सकता कि अगर भर्ती प्रक्रिया के दौरान वह प्रैग्नेंट हो जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि ऐसे किसी भी कदम का आधुनिक भारत में कोई स्थान नहीं है।

अंग्रेजी अखबार 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2013 के प्रारंभ में एएमसी में शॉर्ट सर्विस कमिशन के लिए आवेदन करने वाली याचिकाकर्ता को फरवरी 2014 में सर्विस ज्वाइन करने के लिए कहा गया। उसे सभी परीक्षाएं और मेडिकल टेस्ट्स में सफलता मिलने के बाद ज्वाइनिंग के लिए कहा गया था। दूसरी ब्रांचेस से अलग, 45 साल तक की शादीशुदा महिलाएं भी एएमसी में शामिल होने के लिए योग्य हैं। जैसा कि मिलिट्री एकेडमी के साथ निवास स्थान के पास अस्पतालों को ज्वाइन करने वाले अभ्यर्थियों के लिए कोई भी ट्रेनिंग नहीं होती है। इन सभी को बाद में आठ महीने का एक बेसिक इन-सर्विस कोर्स पूरा करना होता है। जिसे फ्लैक्सिविल टाइम पीरियड में पूरा करना होता है।

इसके बाद भी, आवेदन और ज्वाइनिंग के दौरान, याचिकाकर्ता बीच में ही प्रैग्नेंट हो गई। उसने ज्वाइनिंग के दिन इस बात का खुलासा कर दिया। जिसके बाद उसे ड्यूटी करने से मना कर दिया गया। उसे बताया गया कि वह ज्वाइन नहीं कर सकती, क्योंकि उसकी प्रैग्नेंसी से उसका स्वास्थ्य गिर सकता है। उसकी उम्मीदवारी को रद्द कर दिया गया। इसके अलावा उसे सलाह दी गई कि अगर वह फिर भी एएमसी में शामिल होना चाहती है, तो उसे पूरी चयन प्रक्रिया से एक बार फिर गुजरना होगा। 

पीड़ित होकर याचिकाकर्ता ने साल 2014 में हाईकोर्ट में गुहार लगाई। उसने कहा कि प्रैग्नेंसी स्वास्थ्य में गिरावट ना होकर शादी और स्त्रीत्व की एक घटना थी। याचिकाकर्ता ने कहा कि उस समय कोई समस्या नहीं होती, अगर उसने इस बारे में खुलासा नहीं किया होता। या ज्वाइनिंग के एक दिन के बाद प्रैग्नेंट हुई होती या ज्वाइनिंग की तारीख से एक दिन पहले बच्चे को जन्म दिया होता। जैसा कि पैरामिलिट्री फोर्सेस में यूनिफॉर्म्ड डॉक्टर्स से सीधे तौर पर बच्चे के जन्म के बाद ज्वाइन करने के लिए कहा जाता है, जिससे प्रैंग्नेंसी के कारण कोई समस्या ना हो।

याचिका पर संवैधानिक प्रावधानों, शर्तों और दुनिया भर के न्यायिक मामलों पर विचार किया गया। जिस आधार पर 36 पेजों के आदेश में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस हरिंदर सिंह सिंधू ने कहा, "एक बच्चे को जन्म देने और रोजगार के बीच एक को चुनने के लिए मजबूर करना, महिला के प्रजनन और रोजगार के अधिकारों में हस्तक्षेप करते है। ऐसे किसी भी कदम की आधुनिक भारत में कोई जगह नहीं है।" हाईकोर्ट ने कहा, रोजगार को ध्यान में रखते हुए, सरकार मैटर्निटी लीव दे सकती है या वैकेंसी को आरक्षित रख सकती है, जिसे बच्चे के जन्म के बाद उसे दी जा सके। 

 


Related Story

Get Breaking News First and Latest Updates from India and around the world on News24. Follow News24 and Download our - News24 Android App . Follow News24online.com on Twitter, YouTube, Instagram, Facebook, Telegram , Google समाचार.

Tags :

Top