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सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- पंजाब में सिख अल्पसंख्यक कैसे?

नई दिल्ली (19 जनवरी): सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने सोमवार को यह परीक्षण करने का फैसला किया कि क्या एक राज्य में किसी ऐसे धार्मिक समुदाय को अल्पसंख्यक दर्ज़ा दिया जा सकता है जो कि उस राज्य में संख्याबल के आधार पर मज़बूत हो और जिस पर दूसरे किसी समुदाय का प्रभुत्व होने का कोई खतरा ना हो। सुप्रीम कोर्ट उन परिस्थितियों पर दोबारा गौर करेगा जिनकी वजह से राज्य सरकार ने समुदाय को धार्मिक और भाषाई आधार पर अल्पसंख्यक घोषित किया हो।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर की अगुवाई वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने वरिष्ठ वकील टीआर अंध्यार्जुना  को इस मामले में एमिकस क्यूरी नियुक्त किया है। साथ ही केंद्र से मामले में पक्षकार बनने के लिए भी कहा है। यह मामला पंजाब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) की तरफ से पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के दिसंबर 2007 के आदेश को चुनौती से संबंधित है, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की उस अधिसूचना को खारिज कर दिया था, जिसमें राज्य सरकार ने एसजीपीसी संचालित शैक्षणिक संस्थाओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया था। अधिसूचना में एसजीपीसी को इन संस्थानों में 50 फीसदी सीटें सिख समुदाय के छात्रों के लिए आरक्षित करने की अनुमति दी गई थी।  हाईकोर्ट ने पंजाब में सिख समुदाय के अल्पसंख्यक दर्जे को संख्या के आधार पर मजबूत होने के कारण अस्वीकार कर दिया था। कुलमिलाकर हाईकोर्ट ने कहा कि पंजाब सरकार ने कोई भी ऐसी सामग्री पेश नहीं की है, जो ये दिखाएं कि सिख ''राज्य में किसी भी दूसरे समुदाय से धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों के मामले में वंचित रहे हों। वे बहुसंख्यक हो सकते हैं और चुनावों में राजनैतिक शक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं।'' मुख्य न्यायाधीश ठाकुर ने कहा, ''यहां, मुद्दा है कि पंजाब में सिख अल्पसंख्यक हैं, या बहुसंख्यक? यह संवेदनशील मुद्दा है।''  संविधान पीठ ने हाईकोर्ट के 2007 के आदेश और सुप्रीम कोर्ट के 2005 में बाल पाटिल केस में दिए फैसले को समानांतर रखकर तुलना की, जो जैनों के अल्पसंख्यक दर्जे से संबंधित था। बाल पाटिल केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी, कि समुदाय को अल्पसंख्यक के तौर पर तभी सुरक्षित किया जाना चाहिए, अगर आशंका हो कि समुदाय पर किन्ही दूसरे समुदायों का प्रभुत्व हो।  2005 के पाटिल आदेश में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एमएन वेंकटाचलैया ने कहा था, ''अल्पसंख्यक को संवैधानिक योजना के तहत एक पहचान योग्य जनसमूह या समुदाय के तौर पर समझा जाता है, जिन्हें उन दूसरे समुदायों से धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों के आधार पर सुरक्षा प्रदान करने योग्य माना जाता है। जो बहुसंख्या में होते हैं और जिनकी चुनावों में लोकतांत्रिक सरकार में राजनैतिक शक्ति पाने की संभावना होती है।''   बेंच ने वरिष्ठ वकील केके वेणुगोपाल से एक ओपन कोर्ट में परामर्श किया। वेणुगोपाल कोर्ट के इन परिस्थितियों पर स्पष्टता देने के प्रयास के लिए तैयार हो गए। जिनके आधार पर राज्य सरकार समुदायों को धार्मिक या भाषाई आधार पर अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकती है।  


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