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इलाहाबाद HC का आदेश, संविधान का उल्लंघन है तीन तलाक

इलाहाबाद (9 मई): तीन तलाक के मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पण की है। कोर्ट ने कहा है कि कोई भी पर्सनल लॉ संविधान के दायरे के अंदर रहकर ही काम कर सकता है। इस तरह का पर्सनल लॉ नहीं हो सकता जो महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों का हनन करे। 

हाईकोर्ट ने कहा, ''पर्सनल लॉ के नाम पर मुस्लिम महिलाओं सहित सभी नागरिकों को म‍िले अनुच्छेद 14, 15 और 21 के मूल अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। जिस समाज में महिलाओं का सम्मान नहीं होता है, उसे सिविलाइज्ड नहीं कहा जा सकता। कोई भी मुस्लिम पति ऐसे तरीके से तलाक नहीं दे सकता है, जिससे समानता और जीवन के मूल अधिकारों का हनन होता हो। कोई भी पर्सनल लॉ संविधान के दायरे में ही लागू हो सकता है।'' वहीं, फतवे पर कोर्ट ने कहा, ''ऐसा कोई फतवा मान्य नहीं है, जो न्याय व्यवस्था के ख‍िलाफ हो।''- हाईकोर्ट ने तीन तलाक से पीड़ित वाराणसी की सुमालिया द्वारा पति अकील जमील के खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न केस को रद्द करने से भी इनकार कर दिया। ये आदेश जस्टिस एसपी केसरवानी की स‍िंगल बेंच ने अकील जमील की प‍िटीशन को खारिज करते हुए दिया है।- अकील जमील का कहना था कि उसने पत्नी सुमालिया को तलाक दे दिया है और दारुल इफ्ता जामा मस्जिद आगरा से फतवा भी ले लिया है। इस आधार पर उस पर दहेज उत्पीड़न का दर्ज मुकदना रद्द होना चाहिए।- कोर्ट ने एसीजेएम वाराणसी के समन आदेश को सही करार देते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया आपराधिक केस बनता है। कोर्ट ने कहा कि फतवे को कानूनी बल नहीं म‍िला है, इसलिए इसे जबरन थोपा नहीं जा सकता है। अगर इसे कोई लागू करता है तो अवैध है और फतवे का कोई वैधानिक आधार भी नहीं है।


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