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Maha Shivaratri 2020: सोमनाथ में है दुनिया का पहला ज्योतिर्लिंग मंदिर

देश में कुल 12 ज्योतिर्लिंग (Jyotirlinga) मंदिर हैं। इसमें से पहला ज्योतिर्लिंग सोमनाथ (Somnath) में ही है। समुद्र के किनारे बने सोमनाथ का मंदिर विश्वप्रसिद्ध है। यह मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र में समुद्र के किनारे स्थित है। इस मंदिर को अब तक 17 बार नष्ट किया गया है और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया।

Somnath Mandir

नई दिल्ली (15 फरवरी): हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि (Maha Shivaratri 2020) का खास महत्व है। महाशिवरात्रि के पर्व को भारत ही नहीं दुनियाभर में रहने वाले हिंदू बेहद उत्साह और श्रध्दा के साथ मनाते हैं। भोले भंडारी की भक्ति के लिए यह दिन बेहद खास माना जाता है। हर साल फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि  का पर्व मनाया जाता है। इस साल 21 फरवरी को यह महापर्व मनाया जाएगा। इस दिन दुनियाभर के मंदिरों में भगवान शिव के भक्त हजारों-लाखों की तादाद में भोलेनाथ के दर्शन और पूजा पाठ के लिए पहुंचते हैं। इसमें सोमनाथ मंदिर भी शामिल है। यहां उमड़ने वाले भक्तों की भीड़ और आस्था सैलाब ऐसा होता है जिसमें हर कण भक्तिमय हो जाता है। 

Jyotirlinga

देश में कुल 12 (Twelve) ज्योतिर्लिंग (Jyotirlinga) हैं। इसमें से पहला ज्योतिर्लिंग सोमनाथ (Somnath) में ही है। समुद्र के किनारे बने सोमनाथ का मंदिर विश्वप्रसिद्ध है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को इस पृथ्वी का भी पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात के सौराष्ट्र में समुद्र के किनारे स्थित है। बताया जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। इसे अब तक 17 बार नष्ट किया गया है और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया। शुरूआत से ही सोमनाथ मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान और पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। सोमनाथ देश के सबसे अधिक पूजे जाने वाले तीर्थस्थलों में से एक है। सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी के अनुसार चंद्रमा ने दक्ष प्रजापति की 27 बेटियों से शादी की थी, लेकिन चंद्रमा ने एक पत्नी रोहिणी को छोड़कर बाकी सभी पत्नियों को त्याग दिया, जिसके बाद प्रजापति द्वारा चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया गया। इस श्राप से छुटकारा पाने और अपनी खोई हुई चमक और सुंदरता को वापस पाने के लिए इसी जगह पर भगवान शिव की अराधना कर चंद्रमा ने श्राप से मुक्ति पाई थी।

Mahashivratri, Somnath Temple

पुराणों के मुताबिक शिवजी (Shivji) जहां-जहां स्वयं प्रगट हुए उन 12 स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। भगवान शिव के इन ज्योतिर्लिंग को प्रकाश लिंग भी कहा जाता है। ये पूजा के लिए भगवान शिव के पवित्र धार्मिक स्थल और केंद्र हैं। शिव को स्वयम्भू के रूप में भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है स्वयं उत्पन्न। मान्यता के मुताबिक इन 12 ज्योतिर्लिंग पर भगवान शिव स्वयं ज्योति रूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि बारह ज्योतिर्लिंगों का दर्शन करने वाला प्राणी सबसे भाग्यशाली होता है। शिवपुराण में सभी 12 ज्योतिर्लिंगों का सही क्रम और उनसे जुड़ी खास जानकारी वर्णित है। यहां सालों भर भोले भंडारी के भक्तों की भीड़ लगी रहती है। वैसे तो ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं, लेकिन शिव पुराण के अनुसार उस समय आसमान से ज्योति पिंड पृथ्वी पर गिरे और उनसे पूरी पृथ्वी पर प्रकाश फैल गया। इन्हीं पिंडों को 12 ज्योतिर्लिंग का नाम दे दिया गया है। वहीं इसके पीछे एक कहानी यह भी है कि ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति भगवान शंकर और भगवान ब्रह्मा के विवाद को निपटाने के लिए हुई थी।

दंतकथाओं के अनुसार सोमनाथ मंदिर भगवान चंद्रदेव ने खुद बनाया था।  सोने से बने सोमनाथ मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए। 1026 ईसवी में महमूद गजनवी ने इस पर हमला करके इसे लूटा। फिर मालवा के परमार राजा भोज और गुजरात के सोलंकी राजा भीम ने फिर इसका निर्माण कराया। इसके बाद मुगल शासक औरंगजेब ने 1706 में मंदिर पर आक्रमण किया। इस तरह मंदिर पर कई हमले हुए। 

भारत को अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद मंदिर के पुनर्निमाण का मुद्दा एक बार फिर सामने आया। ऐसा बताया जाता है कि खुद सरदार पटेल और केएम मुंशी महात्मा गांधी के पास गए। उन्होंने महात्मा गांधी से कहा कि वो उसी स्थल पर मंदिर बनवाना चाहते हैं। गांधी जी ने जीर्णोद्धार के लिए जनता से पैसे जुटाने की योजना बताई, उन्होंने सरकारी पैसा इसमें न लगाने की बात कही थी। लेकिन गांधी जी की हत्या और सरदार पटेल की मृत्यु के बाद केएम मुंशी ने मंदिर के जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी ली। बताया जाता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी सोमनाथ मंदिर के निर्माण से सरकार को दूर रखना चाहते थे। वो इस कदम को भारत की आधुनिक धर्मनिरपेक्ष छवि के विपरीत मानते थे। इसके बाद केएम मुंशी ने बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट (1950) के तहत पहली बार ट्रस्ट बनाया। साल 1951 से यही ट्रस्ट मंदिर की देखरेख और संचालन करता है।


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