2019 के लिए राहुल कितने तैयार?

नई दिल्ली (20 मई): तमाम सियासी उठापटक के बाद कांग्रेस दक्षिण का किला बचाने में कामयाब रही। लेकिन इस कामयाबी के कितने मायने हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस 78 सीटें जीतने के बाद भी अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी। कर्नाटक के चुनावी समर में उम्मीद जताई जा रही थी कि जेडीएस किंग मेकर का काम करेगी लेकिन मौके का फायदा देखते हुए जेडीएस ने ऐसी राजनैतिक बिसात बिछाई जिससे महज 37 सीटों के बावजूद भी जेडीएस नेता खुद ही कर्नाटक का किंग बन गए। औऱ इसी के साथ कांग्रेस और जेडीएस के मुताबिक कर्नाटक में लोकतंत्र की हत्या होने से बच गई। बाकई ये अपने आप में बेहद ही हस्यासपद है। कल कर्नाटक विधानसभा में बीएस येदियुरप्पा का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देते ही ऐसा लगा जैसे कांग्रेस में किसी ने जान फूंक दी हो।औऱ तुरंत ही कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सूरजेवाला मीडिया के सामने आए और कांग्रेस के संघर्ष और कार्यकर्ताओं की पराकाष्ठा का गुणगान करते दिखे। वैसे कर्नाटक की इस जीत को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की अध्यक्ष बनने के बाद पहली जीत के चश्मे से भी देखा जा रहा है।2019 की राजनीति का रास्ता कितना आसान:

मौजूदा वक्त में अगर भारत के मानचित्र पर अगर एक नजर डाली जाए तो ये समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है कि कांग्रेस हाशिए पर जा चुकी है। राजनैतिक हलकों में कांग्रेस का कमजोर होना भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बनती जा रही है इस बात से भी गुरेज नहीं किया जा सकता है। जब कोई राष्ट्रीय राजनैतिक दल किसी राज्य में खुद को वापस लाने के लिए रीजनल यानि कि क्षेत्रिय दलों से समर्थन लेने की जगह देने लगे तो समझना कठिन नहीं है कि इन दिनों कांग्रेस अपने सबसे बुरे वक्त से गुजर रही है।पीएम बनने की राहुल की दावेदारी:

कर्नाटक चुनाव के दौरान राहुल गांधी एक मंच पर बोल गए कि 2019 में वो प्रधानमंत्री पद के लिए पूर्णतया तैयार हैं जिसके बाद राजनैतिक गलियारों में इसकी जमकर अलोचना की गई। यहां पर समझने योग्य ये है कि एक तरफ तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 2019 के लिए सबको एक साथ लाने की कवायद कर रहीं है तो उनका भी ये ख्याल हो सकता है कि वो देश की बागडोर संभाले। अब ऐसे में सवाल उठता है कि ये गठजोड़ 2019 आते-आते धरा न रह जाए। बहराल, सभी विपक्षी दलों को समझना होगा कि मौजूदा वक्त में पीएम मोदी की अगुवाई वाले भाजपा के रथ को रोकना आसान नहीं है। इसके लिए जमीनी तौर पर व्यापक स्तर पर काम करने की जरुरत है। नहीं तो बाकी राजनैतिक दलों के हालात किस स्थिति से गुजर रहे हैं इसका अंदाजा साफ तौर पर लगाया जा सकता है।