HOLI 2019: जब नदी किनारे सजती थीं होली की महफिलें, ये होती थी खासियत

Image source google

न्यूज 24 ब्यूरो नई दिल्ली, (19 मार्च) :  नदी किनारे बसे शहरों में होली के त्योहार की कुछ अलग ही रौनक होती है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को जब पूरी दुनिया होली के रंगों में डूबी होती है, तब यहां अलग ही किस्म की सरगर्मियां तारी होती हैं । इतिहास के पिटारे की कई यादें इनकी गवाह भी हैं।  

वहीं, दिल्ली के इतिहास में होली मनाने से जुड़े कई किस्से आज भी दोहराए जाते हैं। कहा जाता है कि यमुना तट पर लाल किले के पीछे होली का खास आयोजन होता था। यह होली दिन में नहीं, बल्कि रात में धूमधाम से मनाई जाती थी। इस अनूठी होली का जिक्र लेखक महेश्वर दयाल ने अपनी किताब ‘दिल्ली जो एक शहर था’ में किया है। 


वह लिखते हैं कि राजा-रानी और राजकुमारी किले के एक हिस्से से बैठकर इस आयोजन का लुत्फ उठाते थे। यहां नृतकों के ग्रुप कदम थिरकाते थे, तो बहुरूपिये अपने स्वांग से लोगों को हंसाते थे। आखिर में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाले को राजा की ओर से सम्मानित किया जाता था। इस पूरी प्रक्रिया को ‘कुफ्रकचहरियां’ कहा जाता था।

कनपुरिया गंगा मेला

1942 के पह ले तक उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर में भी होली बाकी शहरों की तरह आम तरीके से ही मनाई जाती थी, लेकिन इस साल कुछ स्वतंत्रता सेनानियों
को पकड़ कर जेल में डाल दिया गया था। अंग्रेजों ने होली पर भी उन्हें रिहा नहीं किया था। इस वजह से पूरे शहर में खूब जुलूस निकाले गए। उस साल ऐन होली के दिन होली नहीं मनाई गई। आखिरकार उन स्वतंत्रता सेनानियों को रिहाई मिली।  उस दिन अनुराधा नक्षत्र था और पूरे शहर ने असल होली उस दिन ही मनाई। 


गंगा किनारे मेला भी लगा। तब से अब तक होली के 7 दिन बाद अनुराधा नक्षत्र में कानपुर में गंगा मेला मनाया जाता है। यह मेला कानपुर की होली को बाकी जगहों से अलग और अनोखा बनाता है। यहां सन् 1942 के बाद से ही लोग गंगा मेला के दिन होली खेलते हैं और फिर नहा-धोकर चल पड़ते हैं गंगा घाट की ओर होली को अलविदा कहने।

अस्सी का होली कवि सम्मेलन

बनारस के गंगा घाटों पर छोटी होली के दिन शाम की गंगा आरती के साथ ही लोग होलिका दहन देखने भी दूर-दूर से आते हैं। बनारस के दशाश्वमेध घाट पर गंगा किनारे जब होलिका दहन होता है, तब नजारा देखने लायक होता है। यहां आने-जाने के सभी रास्ते रंगों में डूब जाते हैं। कई वर्षों से होते आ रहे इस दहन के बाद शाम को फिर एतिहासिक आरती होती है। यहां के अस्सी घाट पर एक समय बहुत दिलचस्प कवि सम्मेलन होता था, जिसका नाम था ‘अस्सी का होली कवि सम्मेलन’। इसे शुरू किया था चकाचक बनारसी (असली नाम रेवती रमण श्रीवास्तव) नाम के कवि ने ।


 इस सम्मेलन में सांड बनारसी, बेधड़क बनारसी और बेढब बनारसी जैसे कवि भी हिस्सा लेते थे। जैसा कि कवियों के नाम से ही जाहिर है, सम्मेलन में ठेठ बनारसी अंदाज में देश दुनिया की मौजूदा स्थिति पर तंज कसा जाता था। भांग-ठंडई और रंग के सुरूर के बीच कविताओं का दौर कई बार सुबह तक चलता था। ये कविताएं अकसर सभ्य समाज की भाषा से परे भी होती थीं।