हिमाचल में किसानों का हाल बेहाल, खेतों में गाड़ी खड़ी कराने को हुए मजबूर


ललन कुमार झा,न्यूज 24 ब्यूरो, शिमला (13 जून):  हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला की ओर जाते हुए रास्ते में पड़ने वाली छोटी-छोटी पहाड़ियों पर नज़र डालें तो आपको कई नई-नवेली कारें खड़ी हुई दिखाई देंगी। पहली नज़र में देखें तो ऐसा लगता है कि ये कारें किसानों की समृद्धि की गवाह बनकर खड़ी हुई हैं।



 लेकिन ये एक भ्रम है जो इन गांवों में पहुंचते ही दूर होने लगता है, क्योंकि इन गांवों के खेतों में कभी हरी-हरी फसलें लहलहाया करती थीं। अब हालात यह हैं कि यहां सैकड़ों गाड़ियां खड़ी नज़र आती हैं।  ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर वो क्या वजह थी, जिसके चलते किसान अपनी ज़मीनों पर फसल उगाने की जगह कारें खड़ी करने को तैयार हुए।



ये जगह हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से मात्र 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित है, लेकिन इसके बाद भी अब तक अधिकारियों की नज़र इस समस्या की ओर अभी तक नहीं पड़ी है। जबकि इस प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की है।



खेती छोड़ने को क्यों मजबूर हुए किसान



शिमला परवानू राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित कस्बे शोगी में कई किसानों ने अपनी ज़मीनों पर खेती करना बंद कर दिया है। यहां के किसान काफी लंबे समय से जंगली सुअरों, बंदरों और नील गायों के आतंक से परेशान थे।दिन में किसानों की फसलों को बंदर नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं, रात के समय जंगली सुअर और नील गाय इनकी फसल चट कर जाते हैं।



 ऐसे में इन किसानों की जमीनों पर एक कार शोरूम की गाड़ियां खड़ी होना शुरू हो गई हैं जो कि कुछ दिन तक यहां खड़ी रहने के बाद शोरूम में चली जाती हैं। स्थानीय किसानों के मुताबिक़, ये घाटे का सौदा नहीं है, क्योंकि उन्हें उनकी ज़मीन पर खेती किए बगैर पर प्रति कार 100 रुपये प्रतिमाह मिल जाता है। यहां के लगभग पांच-छह गांवों में एक हज़ार से ज़्यादा गाड़ियां खड़ी हैं।



 इसकी शुरुआत लगभग तीन साल पहले हुई थी जब बस एक गांव में ये शुरुआत की गई थी। दालें, टमाटर, शिमला मिर्च, गोभी, मूली और मक्का उगाती थी, लेकिन बंदरों के हमलों की वजह से उन्होंने चार साल पहले मक्का उगाना बंद कर दिया था। इसके बाद बंदरों ने सब्जी के खेतों पर भी हमला बोलना शुरू कर दिया. जंगली सुअरों और नील गाय ने भी खेती करना लगभग नामुमकिन बना दिया।



बंदर बने किसानों की आफत



पर्यावरण और वन मंत्रालय ने हिमाचल प्रदेश की 91 तहसीलों और उप-तहसीलों में बंदरों को पीड़क जंतु करार दिया है। इसके बाद किसान अपने खेतों में फसलों को बचाने के लिए बंदरों को जान से मार सकते हैं, लेकिन धार्मिक मान्यताओं की वजह से किसान बंदरों को मारने के लिए तैयार नहीं है और वन विभाग से बंदरों की जनसंख्या कम करने के लिए कदम उठाने की मांग कर रहे हैं।



आधिकारिक आंकड़ों की मानें तो हर साल बंदरों और जंगली सुअरों के हमले की वजह से लगभग 650 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। वहीं, सरकार ने बंदरों की नसबंदी करने पर बीते दस सालों में 20 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, इस प्रक्रिया में 1.41 लाख बंदरों की नसबंदी भी की जा चुकी है।