कैसे बना INDIA

डॉ. संदीप कोहली, नई दिल्ली (11 अगस्त): 15 अगस्त 2016 को देश आजादी की 70वीं सालगिरह मनाएगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी के लिए देशवासियों को कितना संघर्ष करना पड़ा था, कितनी कुर्बानियां देनी पड़ी थीं। भारत की आजादी के लिए 1757 से 1947 के बीच कई संघर्ष हुए। इन्हीं संघर्षों का नतीजा है कि आज हम आजादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं। आईए जानते हैं भारत की आजादी से जुड़ी यह अविश्वनीय कहानियां... 

भारत की आजादी का इतिहास

ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन- ईस्ट इंडिया कंपनी एक निजी व्यापारिक कंपनी थी, जिसने 1600 ई. में शाही अधिकार पत्र द्वारा व्यापार करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। 1708 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की प्रतिद्वन्दी कम्पनी 'न्यू कम्पनी' का 'ईस्ट इण्डिया कम्पनी' में विलय हो गया। परिणामस्वरूप 'द यूनाइटेड कम्पनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ इंग्लैण्ड ट्रेडिंग टू ईस्ट इंडीज' की स्थापना हुई। कम्पनी और उसके व्यापार की देख-रेख 'गर्वनर-इन-काउन्सिल' करती थी।

1757 प्लासी का युद्ध- प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर नदिया जिले में गंगा नदी के किनारे 'प्लासी' नामक स्थान में हुआ था। इस युद्ध में एक ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी तो दूसरी ओर थी बंगाल के नवाब की सेना। कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में नबाव सिराजुद्दौला को हरा दिया था। युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है क्योंकि यहीं से भारत की दासता की कहानी शुरू होती है। पलासी के युद्ध के बाद ब्रिटिश भारत में राजनीतिक सत्ता जीत गए और 200 साल तक राज किया। 

ब्रिटिश सरकार की विस्तारवादी नीति... - 1757 में प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराने के बाद कर बंगाल पर अधिकार कर लिया।  - प्लासी की लड़ाई के बाद 1773 में रेग्युलेटिंग एक्ट लाया गया। - एक्ट का उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की गतिविधियों को ब्रिटिश सरकार की निगरानी में लाना था। - इसी एक्ट के तहत भारत में गवर्नर-जनरल का पद की सृष्टि की गई। - सबसे पहले वारेन हेस्टिंग्स इस पद पर नियुक्त हुए वे 1774 से 1786 तक इस पद पर रहे। - इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत में विस्तारवाद की नीति पर काम करना शुरू कर दिया। - 1792 में कंपनी ने टीपू सुल्तान को हराकर दक्कन (दक्षिण)पर अपनी पकड़ मजबूत की।  - 1819 में मराठो को हारने के बाद कंपनी ने देश में बड़ा हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया।  - तब भारत कुल विश्व व्यापार में 23% की भागीदारी रखता था जबकि ब्रिटेन मात्र 1.5% था। - 1848 में लॉर्ड डलहौजी उत्तर-पश्चिमी भारत में अपना मजबूत शासन स्थापित कर रहे थे। - लेकिन नाराज और असंतुष्ट सैनिकों ने विद्रोह कर दिया  - जिसे आमतौर पर ‘1857 का विद्रोह’ या ‘1857 के गदर’ के तौर पर जाना जाता है।  - हालांकि ब्रिगेडियर नील जेम्स ने 11 जून को इस विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया। - लेकिन विद्रोह के बाद 1858 में कंपनी को समाप्त कर दिया गया। - भारत की सत्ता सीधे ब्रिटेन के सम्राट के अधीन आ गई। - गवर्नर-जनरल के पद को वाइसराय कर दिया गया। - लॉर्ड कैंनिंग को पहले वायसराय का पद प्रदान किया गया।

1857 का विद्रोह - यह गदर मेरठ में सैनिकों के विद्रोह से शुरु हुआ। उनके विद्रोह का कारण वो नई कारतूस थी जो नई एनफील्ड राइफल में लगती थी।  - इन कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी से बना ग्रीस था जिसे सैनिक को राइफल इस्तेमाल करने की सूरत में मुंह से हटाना होता था।  - यह हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के सैनिकों को धार्मिक कारणों से मंजूर नहीं था और उन्होंने इसे इस्तेमाल करने से मना कर दिया था जिसके चलते वो बेरोजगार हो गए।  - जल्दी ही यह विद्रोह फैल गया खासकर दिल्ली और उसके आसपास के राज्यों में। - इस विद्रोह ने दिल्ली, अवध, रोहिलखंड, बुंदेलखंड, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ और पश्चिमी बिहार को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। - हालांकि तब भी 1857 का विद्रोह असफल कहलाया और एक साल के भीतर ही खत्म हो गया। 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना - 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' की स्थापना 28 दिसम्बर, 1885 ई. में दोपहर बारह बजे बम्बई में 'गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज' के भवन में की गई थी।  - इसके संस्थापक 'ए.ओ. ह्यूम' थे और प्रथम अध्यक्ष व्योमेश चन्‍द्र बनर्जी बनाये गए थे।  - 'भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस' में कुल 72 सदस्य थे, जिनमें महत्त्वपूर्ण थे- दादाभाई नौरोजी, फ़िरोजशाह मेहता, दीनशा एदलजी वाचा थे।  - इसका मुख्य लक्ष्य मध्यमवर्गीय शिक्षित नागरिकों के विचारों को आगे रखना था। 

1906 में कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन  - कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन 1906 ई. में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में सम्पन्न हुआ।  - इस अधिवेशन में नरम दल तथा गरम दल के बीच जो मतभेद थे, वह उभरकर सामने आ गये।  - इन मतभेदों के कारण अगले ही वर्ष 1907 ई. के 'सूरत अधिवेशन' में कांग्रेस के दो टुकड़े हो गये। - अब कांग्रेस पर नरमपंथियों का कब्जा हो गया, इस अधिवेशन में चार प्रस्तावों को पास करवाने में सफल रहा। - स्वराज्य की प्राप्ति, राष्ट्रीय शिक्षा को अपनाना, स्वदेशी आन्दोलन को प्रोत्साहन देना, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करना।

1905 में बंगाल विभाजन - लॉर्ड कर्जन 1899 में भारत का वाइसराय बनकर आए। 1905 में उन्होंने बंगाल विभाजन का कर दिया।  - विभाजन के सम्बन्ध में कर्ज़न का तर्क था कि तत्कालीन बंगाल, जिसमें बिहार और उड़ीसा भी शामिल थे। - काफ़ी विस्तृत है और अकेला लेफ्टिनेंट गवर्नर उसका प्रशासन भली-भाँति नहीं चला सकता है।  - इसके फलस्वरूप पूर्वी बंगाल के ज़िलों की प्राय: उपेक्षा होती है, जहाँ मुसलमान अधिक संख्या में हैं।  - इसीलिए उत्तरी और पूर्वी बंगाल, ढाका तथा चटगाँव डिवीजन में आने वाले पन्द्रह ज़िलों को असम में मिला दिया गया। - पूर्वी बंगाल तथा असम नाम से एक नया प्रान्त बना दिया गया और उसे बंगाल से अलग कर दिया गया।

1909 में मॉर्ले मिंटो सुधार - मॉर्ले मिंटो सुधार को 1909 ई. का 'भारतीय परिषद अधिनियम' भी कहा जाता है।  - तत्कालीन भारत सचिव जॉन मार्ले एवं वायसराय लॉर्ड मिण्टो ने सुधारों का 'भारतीय परिषद एक्ट, 1909' पारित किया, जिसे 'मार्ले मिण्टो सुधार' कहा गया। - भारतीय परिषद सदस्यता के लिए निर्वाचक सिद्धान्त प्रस्तुत किया, साथ ही मुसलमानों के लिए अगल निर्वाचन प्रणाली की व्यवस्था की गई। - मार्ले-मिंटो सुधारों हकीकत में लक्ष्य विकास करने की जगह हिंदू और मुस्लिमों में मतभेद पैदा करना था। 

स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गांधी - 1914-1918 के प्रथम विश्व युद्ध के बाद महात्मा गांधी भारत लौटे और देश की हालत समझकर अहिंसक आंदोलन ‘सत्याग्रह’ के तौर पर शुरु किया।  - 1917 में बिहार में चम्पारन में सत्याग्रह का नेतृत्व किया। - 1920 में ब्रिटिश सरकार द्वारा निष्पक्ष व्यवहार ना होता देख असहयोग आंदोलन शुरु किया।  - 1921 में बम्बई में विदेशी वस्त्रों की होली जलाई, साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध बम्बई में 5 दिन का उपवास, व्यापक अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ किया। - 1922 में चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद जन-आन्दोलन स्थगित किया, उनपर राजद्रोह का मुकदमा चला तथा 6 वर्ष कारावास का दण्ड दिया गया। - 1924 में बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गए। - 1927 में बारदोली सत्याग्रह सरदार पटेल के नेतृत्व किया। - 1928 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन मे भाग लिया-पूर्ण स्वराज का आह्वान। - 1930 में ऐतिहासिक नमक सत्याग्रह- साबरमती से दांडी तक की यात्रा का नेतृत्व किया। - 1931 में गांधी इरविन समझौता- द्वितीय गोलमेज परिषद के लिये इंग्लैण्ड यात्रा की। - 1934 में अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की। - 1936 में वर्धा के निकट से गाँव का चयन जो बाद में सेवाग्राम आश्रम बना। - 1937 में अस्पृष्यता निवारण अभियान के दौरान दक्षिण भारत की यात्रा। - 1942 में भारत छाड़ो आन्दोलन का राष्ट्रव्यापी आह्वान, उनके नेतृत्व में अन्तिम राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह।  - 1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन से भेंट- पूर्वी बंगाल के 49 गाँवों की शान्तियात्रा जहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़कीं हुई थी। - 1947 में साम्प्रदायिक शान्ति के लिये बिहार यात्रा। नई दिल्ली में लार्ड माउन्टबैटेन तथा जिन्ना से भेंट, कलकत्ता में दंगे शान्त करने के लिये उपवास तथा प्रार्थना। - 1948 में जीवन का अन्तिम उपवास 13 जनवरी से 5 दिनों तक दिल्ली के बिड़ला हाउस में - देश में फैली साम्प्रदायिक हिंसा के विरोध में। - 1948 में 30 जनवरी को नाथूराम गोडसे द्वारा शाम की प्रार्थना के लियेजाते समय बिड़ला हाउस में हत्या।

1918 में खेड़ा सत्याग्रह  - 'चम्पारन सत्याग्रह' के बाद गाँधीजी ने 1918 ई. में खेड़ा (गुजरात) के किसानों की समस्याओं को लेकर आन्दोलन शुरू किया। - खेड़ा में गाँधीजी ने अपने प्रथम वास्तविक 'किसान सत्याग्रह' की शुरुआत की थी।  - खेड़ा सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा ज़िले में किसानों का अंग्रेज़ सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक सत्याग्रह (आन्दोलन) था।  - यह महात्मा गांधी की प्रेरणा से वल्लभ भाई पटेल एवं अन्य नेताओं की अगुवाई में हुआ था।

1919 में जलियांवाला बाग नरसंहार - अमृतसर के जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल, 1919 को शाम को करीब साढ़े चार बजे एक सभा का आयोजन हुआ, इस सभा में 20,000 व्यक्ति इकट्ठे हुए थे।  - दूसरी और जनरल डायर के नेतृत्व वाली अंग्रेजी सेना ने सभा को अवैधानिक घोषित कर दिया था। - डायर ने बिना किसी चेतावनी के 50 सैनिकों को गोलियाँ चलाने का आदेश दिया, 10-15 मिनट में 1650 गोलियाँ दागी गईं। - सरकारी अनुमानों के अनुसार, लगभग 400 लोग मारे गए और 1200 के लगभग घायल हुए थे।

1920 में असहयोग आंदोलन - इसी संहार की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप गांधी जी ने 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। - सितम्बर, 1920 में असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम पर विचार करने के लिए लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में कलकत्ता में 'कांग्रेस का अधिवेशन' हुआ।  - इस अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार भारत में विदेशी शासन के विरुद्ध असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन को प्रारम्भ करने का निर्णय लिया।  - पश्चिमी भारत, बंगाल तथा उत्तरी भारत में असहयोग आन्दोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली।  - इसी दौरान कई शिक्षण संस्थाएं जैसे काशी विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, बनारस विद्यापीठ एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आदि की स्थापना की गई।

1927 में साइमन कमीशन और 1928 लाला लाजपत राय का निधन - असहयोग आंदोलन के खत्म होने के तुरंत बाद भारत की सरकार में नया कमीशन बनाया गया जिसमें सुधारों में किसी भारतीय सदस्य को शामिल नहीं किया गया - साइमन कमीशन की नियुक्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी।  - इस कमीशन में सात सदस्य थे, जो सभी ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सदस्य थे। - यही कारण था कि इसे 'श्वेत कमीशन' कहा गया।   - कमीशन को इस बात की जाँच करनी थी कि क्या भारत इस लायक हो गया है कि यहां लोगों को संवैधानिक अधिकार दिये जाएं। - इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिस कारण इसका बहुत ही तीव्र विरोध हुआ। - आयोग के विरोध के कारण लखनऊ में जवाहर लाल नेहरू, गोविन्द बल्लभ पंत आदि ने लाठियां खाईं।  - लाहौर में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में कई बड़े प्रदर्शन किए। - लाहौर के पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दिया  - उप अधीक्षक सांडर्स जनता पर टूट पड़ा उसकी लाठी की गहरी चोट के कारण लाला लाजपत राय की 17 नवंबर 1928 को मृत्यु हो गई।

1929 में सविनय अवज्ञा आंदोलन - भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1929 में लाहौर अधिवेशन में घोषणा कर दी कि उसका लक्ष्य भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना है।  - महात्मा गांधी ने अपनी इस माँग पर जोर देने के लिए 6 अप्रैल, 1930 को सविनय अविज्ञा आन्दोलन छेड़ा।  - जिसका उद्देश्य कुछ विशिष्ट प्रकार के ग़ैर-कानूनी कार्य सामूहिक रूप से करके ब्रिटिश सरकार को झुका देना था। - ब्रिटिश सरकार ने आन्दोलन को दबाने के लिए सख्त कदम उठाये और गांधी जी सहित अनेक कांग्रेसी नेताओं व उनके समर्थकों को जेल में डाल दिया। 

1930 में दांडी मार्च - सविनय अविज्ञा आन्दोलन के दौरान गांधी जी ने नमक कानून को तोड़ने के उदेश्य से दांडी मार्च किया - 12 मार्च 1930 को सुबह 6.30 बजे 78 सत्याग्रहियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक 358 किमी की यात्रा आरंभ की। - यात्रा का मुख्य उद्देश्य था- "अंग्रेज़ों द्वारा बनाये गए 'नमक क़ानून को तोड़ना' था। - लगभग 24 दिन बाद 1 लाख लोगों के साथ 6 अप्रैल 1930  को दांडी पहुंचकर उन्होंने समुद्रतट पर नमक कानून को तोड़ा।  - महात्मा गाँधी ने दांडी यात्रा के दौरान सूरत, डिंडौरी, वांज, धमन के बाद नवसारी को अपना पड़ाव बनाया था। 

1931 में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा - 23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 'लाहौर षड़यंत्र'(यानी सांडर्स की हत्या का आरोप)में ब्रिटिश सरकार ने फांसी पर लटका दिया।  - लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और शिवराम ने पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट को मारने की योजना बनाई थी।  - उन्होंने 17 दिसंबर 1928 को शाम करीब सवा चार बजे अपनी योजना को अंजाम दिया - लेकिन गलत पहचान के चलते स्कॉट की जगह सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी़ सांडर्स मारा गया।  - इस मामले को लाहौर षडयंत्र के नाम से जाना गया जिसमें राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई।  - ब्रिटिश हुकूमत ने इन तीनों क्रांतिकारियों को निर्धारित समय से एक रात पहले ही फांसी दे दी।  - मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन आक्रोश से डरी सरकार ने 23-24 मार्च को सांय 7.33 बजे ही फांसी दे दी। - और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया। 

मुस्लिम लीग, जिन्ना और पाकिस्तान  - वैसे तो मुस्लिम लीग का गठन सर आगा खान के नेतृत्व में 30 दिसंबर 1906 को दक्का (अब ढाका) में हुआ था।  - मुस्लिम लीग का मकसद भारत के मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और हितों को आगे रखना था। - शुरु शुरू में मोहम्मद अली जिन्ना अखिल भारतीय मुस्लिम लीग में शामिल होने से बचते रहे - लेकिन बाद में उन्होंने अल्पसंख्यक मुसलमानों को नेतृत्व देने का फैसला कर लिया। - 1913 में जिन्ना मुस्लिम लीग में शामिल हो गये और 1916 के लखनऊ अधिवेशन की अध्यक्षता की।  - 1916 के लखनऊ समझौते के कर्ताधर्ता जिन्ना ही थे, यह समझौता लीग और कांग्रेस के बीच हुआ था।  - लेकिन 1934 में मुस्लिम लीग की कमान संभालते ही जिन्ना का मकसद ही बदल गया। - कहा एक केवल मुस्लिम लीग ही मुसलमानों का एक मात्र राजनीतिक साधन है। - 1935 में जिन्ना की डॉ. राजेंद्र प्रसाद से चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने कहा कि कांग्रेस किसी भी जाति,नस्ल या संसकृति का प्रतिनिधित्व नहीं करती। - हिन्दू और मुसलमान दोनों अलग-अलग देश के नागरिक हैं अत: उन्हें अलहदा कर दिया जाये।  - उनका यही विचार बाद में जाकर जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का सिद्धान्त कहलाया। - 1937 में हुए सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली के चुनाव में मुस्लिम लीग ने कई सीटों पर कब्जा किया। - 1930 में मुस्लिम लीग के एक भाषण में मोहम्मद इकबाल ने उत्तर पश्चिम भारतीय राज्य को अलग कर एक राष्ट्र बनाने की मांग की। - 1933 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के छात्र चौधरी रहमत अली ने पहली बार अलग राष्ट्र के लिए पाकिस्तान शब्द रखा। - रहमत अली ने ही 1933 में पाकिस्तान नेशनल मूवमेंट आरंभ किया, 1 अगस्त 1933 से पाकिस्तान नामक एक साप्ताहिक पत्र भी शुरू किया। - 1940 के लाहौर अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर यह कहा गया कि मुस्लिम लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है। - कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, मौलाना अब्बुल कलाम आजाद जैसे नेताओं ने इसकी कड़ी निन्दा की।  - जिन्ना ने 1941 में डॉन समाचार पत्र की स्थापना की, जिसके द्वारा उन्होंने अपने विचार का प्रचार-प्रसार किया।  - जिन्ना ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन की मदद की थी और 1942 में उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध किया था।  - यूनियनिस्ट नेता सिकन्दर हयात खान की मृत्यु के बाद पंजाब में भी मुस्लिम लीग का वर्चस्व बढ़ गया।  - 1944 में गान्धीजी ने बम्बई में जिन्ना से चौदह बार बातचीत की, लेकिन हल कुछ भी न निकला।

सुभाष चन्द्र बोस और आजाद हिन्द फौज - द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज का गठन किया गया।  - इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की। - शुरू में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे। - एक साल बाद सुभाष चन्द्र बोस ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा करते हैं कि अंग्रेजों से आजादी की आशा करना व्यर्थ है। - 21 अक्टूबर 1943 के सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी - इसे जिसे जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। - 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया।  - अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। - 4 फरवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। - 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो से गांधीजी के नाम जारी एक प्रसारण किया और शुभकामनाएं मांगीं। - 21 मार्च 1944 को 'चलो दिल्ली' के नारे के साथ आगे बड़े। - 22 सितम्बर 1944 को उन्होंने कहा, हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की मांग है। - किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया, जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े।  - ऐसे में सुभाष चन्द्र बोस को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन - 14 जुलाई 1942 में वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें भारत से ब्रिटिश शासन तत्काल समाप्त करने की घोषणा की गई। - इसी मिटिंग में भारत छोड़कर जाने के लिए अंग्रेजों को मजबूर करने के लिए 1942 में सामूहिक नागरिक अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का आवाह्न किया गया। - सविनय अवज्ञा आन्दोलन का यह तीसरा चरण था, इससे पहले 1929 और 32 में आंदोलन हुआ था। - 8 अगस्त 1942 को मुम्बई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस के सत्र में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास किया गया जिसे भारत छोड़ो प्रस्ताव के नाम से जाना गया। - गोवालिया टैंक मैदान से गांधीजी ने भाषण दिया, जिसमें कहा, ‘मैं आपको एक मंत्र देना चाहता हूं जिसे आप अपने दिल में उतार लें, यह मंत्र है, ‘करो या मरो’। - इसी गोवालिया टैंक मैदान आगे चलकर अगस्त क्रांति मैदान के नाम से जाना जाने लगा। - 9 अगस्त को गांधी, नेहरू, पटेल, आजाद समेत अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। - इसके बाद जनता ने खुद आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ली और इसे आगे बढाया क्योंकि उस समय नेतृत्व करने वाला कोई नहीं था। - आंदोलन में रेलवे स्‍टेशनों, दूरभाष कार्यालयों, सरकारी भवनों तथा उपनिवेश राज के संस्‍थानों पर बड़े स्‍तर पर हिंसा शुरू हो गई। - इसमें तोड़ फोड़ की ढेर सारी घटनाएं हुईं और सरकार ने हिंसा की इन गतिविधियों के लिए कांग्रेस और गांधी जी को उत्तरदायी ठहराया। - कांग्रेस पर प्रतिबंद लगा दिया गया और आंदोलन को दबाने के लिए सेना को बुला लिया गया। - सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस जनान्दोलन में 942 लोग मारे गये, 1630 घायल हुए, 18000 डीआईआर में नजरबंद हुए तथा 60229 गिरफ्तार हुए। - इस बीच नेता जी सुभाष चंद्र बोस, जो अब भी भूमिगत थे, कलकत्ता में ब्रिटिश नजरबंदी से निकल कर विदेश पहुंच गए। - ब्रिटिश राज को भारत से उखाड़ फेंकने के लिए उन्‍होंने वहां इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) या आजाद हिंद फौज का गठन किया। - 1942 में जापान की फौजों के साथ मिल भारत की और रूख किया। - ब्रिटिश और कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया। - भारत छोड़ो आंदोलन की विशालता और व्यापकता को देखते हुए अंग्रेजों को विश्वास हो गया था कि उन्हें अब इस देश से जाना पड़ेगा। भारत छोड़ो आंदोलन को विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें: hindi.news24online.com/quit-india-movement-83

द्वितीय विश्‍व युद्ध की समाप्‍ति और ब्रिटेन में लेबर पार्टी का सत्ता में आना - 1945 में द्वितीय विश्‍व युद्ध समाप्‍त होने पर ब्रिटिश प्रधान मंत्री क्‍लेमेंट रिचर्ड एटली के नेतृत्‍व में लेबर पार्टी शासन में आई। - विश्‍व युद्ध की समाप्ति के समय ब्रिटिश आर्थिक रूप से कमज़ोर हो चुके थे - वे खुद इंग्‍लैंड में स्‍वयं का शासन भी चलाने में संघर्ष कर रहे थे।  - इसी साल ब्रिटेन के चुनावों में लेबर पार्टी लेबर पार्टी की जीत हुई  - लेबर पार्टी आजादी के लिए भारतीय नागरिकों के प्रति सहानुभूति की भावना रखती थी। - लेबर पार्टी ने भारत सहित ब्रिटेन में तत्‍कालीन उपनिवेश को स्‍वतंत्रता प्रदान करने का वायदा किया था।  - मार्च 1946 में एक केबिनैट कमीशन भारत भेजा गया, जिसके बाद भारतीय राजनैतिक परिदृश्‍य का सावधानीपूर्वक अध्‍ययन किया गया। - एक अंतरिम सरकार के निर्माण का प्रस्‍ताव दिया गया और एक प्रां‍तीय विधान द्वारा निर्वाचित सदस्‍यों और भारतीय राज्‍यों के मनोनीत व्‍यक्तियों को लेकर संघटक सभा का गठन किया गया।

भारत को कैसे मिली आजादी - भारत को आजाद करने का फैसला ब्रिटेन की नई नवेली सरकार ने 20 फरवरी 1947 को ही कर लिया था।  - इंग्लैंड में लेबर पार्टी के सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री रिचर्ड एटली ने एक महत्वपूर्ण पॉलिसी की घोषणा की थी। - इसमें कहा गया था कि ब्रिटेन की सरकार ने यह फैसला कर लिया है कि भारत को जून 1948 तक स्वतंत्र कर दिया जाएगा।  - इसके लिए 12 फरवरी 1947 को ही लॉर्ड माउंटबैटन को भारत का वायसरॉय नियुक्त किया गया था। - लॉर्ड माउंटबेटन का काम था ब्रिटेन के हाथों से भारत को सभी अथॉरिटी देने का प्रबंध करना।  - 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने अपनी योजना देश के नेताओं के सामने प्रस्तुत की। - जिसमे उन्होंने भारत की राजनीतिक समस्या को हल करने के विभिन्न चरणों की रुपरेखा रखी। 

माउंटबेटन योजना - भारत को भारत और पाकिस्तान में विभाजित किया जायेगा - बंगाल और पंजाब का विभाजन किया जायेगा  - उत्तर पूर्वी सीमा प्रान्त और असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह कराया जायेगा। - पाकिस्तान के लिए संविधान निर्माण हेतु एक अलग संविधान सभा का गठन किया जायेगा। - रियासतों को यह छूट होगी कि वे या तो पाकिस्तान या भारत में सम्मिलित हो जाये या फिर खुद को स्वतंत्र घोषित कर दें। - भारत और पाकिस्तान को सत्ता हस्तांतरण के लिए 14-15 अगस्त 1947 का दिन नियत किया गया। - ब्रिटिश सरकार ने भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 को जुलाई 1947 में पारित कर दिया।  - इसमें ही वे प्रमुख प्रावधान शामिल थे जिन्हें माउंटबेटन योजना द्वारा आगे बढ़ाया गया था| - सर रेडक्लिफ की अध्यक्षता में दो आयोगों का ब्रिटिश सरकार ने गठन किया। - आयोग का कार्य विभाजन की देख-रेख और नए गठित होने वाले राष्ट्रों की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं को निर्धारित करना था| - स्वतंत्रता के समय भारत में 562 छोटी और बड़ी रियासतें थीं।

आजादी का दिन 15 अगस्‍त ही क्‍यों चुना गया - लार्ड माउंटबेटन ने निजी तौर पर भारत की स्‍वतंत्रता के लिए 15 अगस्‍त का दिन तय करके रखा था  - माउंटबेटन इस दिन को वे अपने कार्यकाल के लिए "बेहद सौभाग्‍यशाली" मानते थे।  - इसके पीछे कि खास वजह थी कि इसी दिन जापानी सेना ने उनके सामने आत्‍मसमर्पण किया था। - दूसरे विश्‍व युद्ध के दौरान माउंटबेटन ब्रिटिश सेनाओं के कमांडर थे।

आधी रात की आजादी - जब 3 जून को यह फैसला किया गया कि 15 अगस्त को आजादी दी जाएगी तो भारतीय ज्योतिषियों ने इस पर एतराज किया।  - उनके अनुसार यह दिन काफी अमंगल होता देश के लिए, लेकिन लॉर्ड तो इसी दिन के लिए अड़े हुए थे। - इसलिए ज्योतिषियों ने कहा कि आजादी का समय 14 अगस्त रात 12 बजे हो। - क्योंकि कैलेंडर के अनुसार 12 बजे से अगले दिन का आरंभ माना जाता है। - अंग्रेज भी यह मानते हैं कि रात 12 बजे से दिन बदल जाता है, माउंटबेटन ने स्वीकार कर लिया। - 14 अगस्त को आजादी की घोषणा होते ही मीटिंग बुलाई गई।  - यह मीटिंग नई दिल्ली में रात 11 बजे बुलाई गई।  - इस सेशन की अगुवाई डॉंक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की।  - मीटिंग का आरंभ सुचेता कृपलानी ने ‘वंदे मातरम्’ गाकर किया। - 14 अगस्त की मध्यरात्रि को जवाहर लाल नेहरू का ऐतिहासिक भाषण हुआ 'ट्रिस्ट विद डेस्टनी'। - इस भाषण को पूरी दुनिया ने सुना, लेकिन गांधी उस दिन नौ बजे सोने चले गए थे। - 15 अगस्त के दिन की शुरुआत सुबह 8.30 बजे हुई, जब वायसराय भवन(राष्ट्रपति भवन) में शपथग्रहण समारोह हुआ।  - नई सरकार ने सेंट्रल हॉल (जिसे आज दरबाल हॉल कहा जाता है)में शपथ ली। - दोपहर में नेहरू ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल की सूची सौंपी और बाद में इंडिया गेट के पास प्रिसेंज गार्डेन में एक सभा को संबोधित किया। - पूरा देश आजादी का उत्सव मना रहा था, राष्ट्रपति भवन, संसद आदि के आसपास करोड़ों लोगों का हुजूम था। - नेहरू ने 16 अगस्त, 1947 को लाल किले से झंडा फहराया था। - 17 अगस्त को भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा रेखा का निर्धारण हुआ था, जिसे रेडक्लिफ लाइन कहा जाता है - भारत 15 अगस्त को आजाद जरूर हो गया, लेकिन उसका अपना कोई राष्ट्रगान नहीं था। - रवींद्रनाथ टैगोर जन-गण-मन 1911 में ही लिख चुके थे, लेकिन यह राष्ट्रगान 1950 में ही बन पाया।

गांधीजी और दंगे की 'काली रात' - एक तरफ देश में आजादी का जश्न था तो दूसरी तरफ हिंदू-मुस्लिम दंगों में खून की होली खेली जा रही थी - महात्मा गांधी आज़ादी के दिन दिल्ली से हज़ारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में थे - जहां वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन पर थे - जब तय हो गया कि भारत 15 अगस्त को आज़ाद होगा तो जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को ख़त भेजा - इस ख़त में लिखा था, "15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा. आप राष्ट्रपिता हैं. इसमें शामिल हो अपना आशीर्वाद दें" - गांधी ने इस ख़त का जवाब भिजवाया, "जब कलकत्ते में हिंदु-मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं"

भारत-पाकिस्‍तान का विभाजन - भारत और पाकिस्‍तान का बंटवारा महज 50 से 60 दिनों के भीतर लाखों लोगों का विस्‍थापन था, जो विश्‍व में कहीं नहीं हुआ।  - 10 किलोमीटर लंबी लाइन में लाखों लोग एक देश की सीमा को पार कर दूसरे देश की सीमा में जा रहे थे।  - तकरीबन पौने दो करोड़ लोग जमीन, जायदाद, दुकानें, संपत्‍ति, खेती छोडकर हिंदुस्‍तान से पाकिस्‍तान और पाकिस्‍तान से हिंदुस्‍तान लोग जा रहे थे। - 1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए। - धर्म के नाम हुए इस विभाजन में मानवता शर्मसार हुई, 10 हजार से ज्‍यादा महिलाओं का अपहरण किया गया, उनके साथ बलात्‍कार हुआ। - अनुमान के मुताबिक 2 लाख से 20 लाख के बीच लोग मारे गए, सैंकड़ों बच्‍चे अनाथ हो गए। - विभाजन का यह काला अध्‍याय आज भी इतिहास के चेहरे पर बदनुमा दाग की तरह है।