आजादी के बाद इसरो की कामयाबी के आगे झुकी दुनिया

नई दिल्‍ली (13 अगस्त): देश 15 अगस्त को आजादी की 70वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। ऐसे में भारत ने सबसे ज्यादा कामयाबी अंतरिक्ष में पाई है। 70 सालों के इस सफर में भारत की इस ताकत के सामने अब दुनिया झुकती है।

भारत ने अपना अंतरिक्ष का सफर जिस वक्‍त शुरू किया था उस वक्‍त अमेरिका और रूस इस क्षेत्र में अपने झंडे गाड़ चुके थे। लेकिन अब भारत ने न सिर्फ इस क्षेत्र में अपनी काबलियत को साबित कर दिया है बल्कि आज इसरो के सामने रूस और अमेरिका दोनों ही नतमस्‍तक हैं।

इसकी वजह एक यह भी है कि जिस मार्स मिशन पर अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए थे उसी मार्स मिशन को भारत ने इसकी आधी कीमत में ही पूरा कर दिखाया।

अंतरिक्ष में भारत का वर्ल्‍ड रिकॉर्ड: भारत के मार्स मिशन की लागत 450 करोड़ रुपये (करीब 6 करोड़ 90 लाख डॉलर) है। यह नासा के पहले मंगल मिशन का दसवां और चीन-जापान के नाकाम मंगल अभियानों का एक चौथाई भर है। अंतरिक्ष यात्रा के इस सफर में भारत ने एक मिशन में सबसे अधिक सैटेलाइट भेजकर वर्ल्‍ड रिकार्ड भी बनाया तो वहीं खुद का क्रायोजनिक इंजन बनाकर अमेरिका की चुनौती का सफल जवाब भी दिया।

थुंबा से हुई थी भारत के अंतरिक्ष मिशन की शुरुआत: भारत ने केरल में मछली पकड़ने वाले क्षेत्र थुंबा से अमेरिकी निर्मित दो-चरण वाला साउंडिंग रॉकेट ‘नाइक-अपाचे’ का प्रक्षेपण किया था। यह अंतरिक्ष की ओर भारत का पहला कदम था। उस वक्‍त भारत के पास न तो इस प्रक्षेपण के लिए जरूरी सुविधाएं थीं और न ही मूलभूत ढांचा उपलब्‍ध था। चूंकि थुंबा रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर कोई इमारत नहीं थी इसलिए वहां के स्‍थानीय बिशप के घर को निदेशक का ऑफिस बनाया गया। प्राचीन सेंट मैरी मेगडलीन चर्च की इमारत कंट्रोल रूम बनी और नंगी आंखों से धुआं देखा गया। यहां तक की रॉकेट के कलपुर्जों और अंतरिक्ष उपकरणों को प्रक्षेपण स्थल पर बैलगाड़ी और साइकिल से ले जाया गया था।

मंगलयान की सफलता: एक एतिहासिक बढ़त 16 नवंबर 2013, को अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में भारत ने एक नया अध्याय लिखा। इस दिन 2:39 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से PSLV C-25 मार्स ऑर्बिटर (मंगलयान) का अंत‍रिक्ष का सफर शुरू हुआ। 24 सितंबर 2014 को मंगल पर पहुंचने के साथ ही भारत इस तरह के अभियान में पहली ही बार में सफल होने वाला पहला देश गया। इसके साथ ही वह सोवियत रूस, नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद इस तरह का मिशन भेजने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया। इसके अतिरिक्त ये मंगल पर भेजा गया सबसे सस्ता मिशन भी है।

जी सेट 19 का सफल प्रक्षेपण उच्च-तकनीक वाले सबसे वजनी भू-स्थैतिक संचार उपग्रह, जी-सैट-19 को 05 जून 2017 को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर कक्षा में सफलतापूर्वक छोड़े जाने के बाद भारत ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में एक बड़ी सफलता हासिल की है। इस उपग्रह को सबसे शक्तिशाली देसी रॉकेट जीएसएलवी मार्क-III द्वारा छोड़ा गया।

अमेरिका से इंकार के बाद स्‍वयं बनाया क्रायोजनिक इंजन जीएसएलवी मार्क-III 18 दिसंबर, 2014 को पहली प्रायोगिक उड़ान के साथ एक प्रोटोटाइप क्रू कैप्सूल ले गया था। उपकक्षीय मिशन ने वैज्ञानिकों की यह समझने में मदद की कि यह यान वायुमंडल में कैसे काम करता है। साथ ही कैप्सूल का परीक्षण भी किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के लिए इस वर्ष यह तीसरी उपलब्धि थी। इसने खुद के किफायती लेकिन प्रभावी क्रायोजनिक इंजन और अंतरिक्ष में 36,000 किलोमीटर पर कक्षा में 4 हजार किलोग्राम तक के भारी भरकम भू-स्थैतिक उपग्रहों को विकसित करने की देश की चाहत को पूरा किया।

पड़ोसी देशों को भी दी सौगात इससे पहले 5 मई 2017 को भारत ने संचार सुविधा को बढ़ाने और पहला दक्षिण-एशिया उपग्रह (एसएएस) छोड़कर अपने 6 पड़ोसियों अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल और श्रीलंका को अनमोल तोहफा दिया था। 2,230 किलोग्राम के संचार अंतरिक्ष यान ने क्षेत्र में नए द्वार खोल दिए और भारत को अंतरिक्ष कूटनीति में अपने लिए अनोखा स्थान बनाने में मदद की। इसरो द्वारा निर्मित और भारत द्वारा पूरी तरह वित्तपोषित, भू-स्थैतिक संचार उपग्रह-9 (जीसैट-9) अपने साथ जीएसएलवी-एफ 9 रॉकेट ले गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे अभूतपूर्व विकास बताते हुए एक संदेश में कहा कि जब क्षेत्रीय सहयोग की बात आती है तो आकाश भी कोई सीमा नहीं है।

कार्टोसेट 2 का सफल प्रक्षेपण पृथ्वी की कक्षा में कार्टोसेट-2 श्रृंखला के उपग्रह सहित रिकॉर्ड-104 उपग्रहों के लिए पोलर सैटलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी सी-37) का इस्तेमाल करने के बाद फरवरी में अंतरिक्ष एजेंसी दुनियाभर में सुर्खियों में आ गयी थी। इस मास्टर स्ट्रोक ने भारत को छोटे उपग्रहों के लिए प्रक्षेपण सेवा प्रदात्ता के रूप में स्थापित कर दिया। पिछले तीन वर्षों के दौरान भारत अपने अंतरिक्ष मिशन में तेजी लाया है। 2016 की करीब दर्जनभर उपलब्धियों में दिसंबर में रिमोर्ट सेंसिंग उपग्रह रिसोर्ससैट-2 के सफलतापूर्वक कार्य करने और जून में अकेले अंतरिक्ष उपग्रह में 20 उपग्रहों, 3 नेवीगेशन उपग्रहों और जीसैट-18 संचार उपग्रहों का रिकॉर्ड प्रक्षेपण शामिल है।

जीसेट-15 संचार उपग्रह 2015 में इसरो ने नवंबर में जीसैट-15 संचार उपग्रह और सितंबर में मल्टी वेवलेंथ स्पेस ऑब्जरवेटर एस्ट्रोसेट छोड़ा। स्वदेश में विकसित उच्च प्रक्षेपक क्रायोजनिक रॉकेट इंजन का 800 सेकेंड के लिए जमीनी परीक्षण किया गया। इसके अलावा पीएसएलवी द्वारा जुलाई में पांच उपग्रह और मार्च में भारतीय क्षेत्रीय नेवीगेशन उपग्रह प्रणाली (आईआरएनएसएस) में चौथा उपग्रह  आईआरएनएसएस-1डी छोड़ा गया।