नोटबंदी के बाद गईं 50 लाख लोगों की नौकरियां,बेरोजगारी की दर हुई दोगुनी: रिपोर्ट

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न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (17 अप्रैल): बेंगलुरु स्थित अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट (CSE) द्वारा मंगलवार को जारी ‘State of Working India 2019' रिपोर्ट में यह कहा गया है कि साल 2016 से 2018 के बीच करीब 50 लाख लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है। बता दें कि साल 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने देश में नोटबंदी का ऐलान किया था और 1000-500 के नोट बंद कर दिए थे। 

सीएसई के अध्यक्ष और रिपोर्ट लिखने वाले मुख्य लेखक प्रोफेसर अमित बसोले ने हफिंगटनपोस्ट  से कहा कि, इस रिपोर्ट में कुल आंकड़े हैं। इन आंकड़ों के हिसाब से 50 लाख रोजगार कम हुए हैं। कहीं और नौकरियां भले ही बढ़ी हों लेकिन ये तय है कि पचास लाख लोगों ने अपना नौकरियां खोई हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है। बसोले ने आगे बताया कि कि डेटा के अनुसार, नौकरियों में गिरावट नोटबंदी के आसपास हुई (सितंबर और दिसंबर 2016 के बीच चार महीने की अवधि में) और दिसंबर 2018 में अपने स्थिरांक पर पहुंची।

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नोटबंदी की घोषणा किए जाने के आसपास ही नौकरी की कमी शुरू हुई, लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इन दोनों के बीच संबंध पूरी तरह से स्थापित नहीं किया जा सकता है। यानी रिपोर्ट में यह साफ तौर पर बेरोजगारी और नोटबंदी में संबंध नहीं दर्शाया गया है। 'सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्लॉयमेंट' की ओर से जारी इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अपनी नौकरी खोने वाले इन 50 लाख पुरुषों में शहरी और ग्रामीण इलाकों के कम शिक्षित पुरुषों की संख्या अधिक है। इस आधार पर रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि नोटबंदी ने सबसे अधिक असंगठित क्षेत्र को ही तबाह किया है। 

अगर तीन सालों की बात करें तो जनवरी-अप्रैल 2016 से सितंबर-दिसंबर 2018 तक, शहरी पुरुष एलएफपीआर की दर 5.8 फीसदी जबकि उसी आयु समूह में डब्ल्यूपीआर की दर 2.8 तक गिर गई है। साथ ही नोटबंदी से भविष्य में भी नौकरी का संकट होने की बात कही गई है और अभी रिपोर्ट का दावा है कि अब तक नोटबंदी के बाद बने हालात सुधरे नहीं है। वहीं रिपोर्ट में कहा गया है कि 20-24 आयु वर्ग में सबसे ज्यादा बेरोजगारी है और नोटबंदी से पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा प्रभावित हुई हैं।

साल 2016 और 2018 के बीच भारत में काम करने वाले पुरुषों की आबादी में 16.1 मिलियन की वृद्धि हुई। वहीं इसके उलट इस अवधि के दौरान डब्ल्यूपीआर की मात्रा में 5 मिलियन नौकरियों का नुकसान हुआ है। बता दें कि अभी तक इस रिपोर्ट में पुरुषों के आंकड़ों को ही शामिल किया गया है। बता दें कि श्रम बल भागीदारी दर को एलएफपीआर कहा जाता है। अगर इसमें महिला कर्मचारियों के आंकड़े शामिल किए जाते हैं तो इस संख्या में और भी इजाफा हो सकता है।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में बेरोजगार ज्यादातर उच्च शिक्षित और युवा हैं। शहरी महिलाओं में कामगार जनसंख्या में 10 फीसदी ही ग्रेजुएट्स हैं, जबकि 34 फीसदी बेरोजगार हैं. वहीं, शहरी पुरुषों में 13.5 फीसदी ग्रेजुएट्स हैं, मगर 60 फीसदी बेरोजगार हैं। इतना ही नहीं, बेरोजगारों में 20 से 24 साल की संख्या सबसे अधिक है। सामान्य तौर पर पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा प्रभावित हुई हैं।