विजय दिवस: आज ही के दिन भारत ने तोड़ा था पाकिस्तान का घमंड, 93000 पाक सैनिकों ने टेके थे घुटने

डॉ. संदीप कोहली,

 

नई दिल्ली (16 दिसंबर): 16 दिसंबर 1971 विजय दिवस हिन्दुस्तान के इतिहास का वो गौरवशाली दिन जब 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने घुटने टेक दिए थे। युद्ध में पाकिस्तानी सेना भारतीय फौजों के सामने पूरे दो हफ्ते भी टिक नहीं पाई। नतीजतन पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने बिना शर्त भारत के पूर्वी सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इसी दिन हमारे सैनिकों ने पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से अलग कर एक नए राष्ट्र को जन्म दिया था। जिसे आज दुनिया बंग्लादेश के नाम से जानती है। आज हम इसी गौरवशाली दिन का इतिहास आपको बताने जा रहे हैं। कैसे हमारे बहादूर जवानों ने 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टकने पर मजबूर कर दिया था।

- जनरल सैम मानेकशॉ 1971 युद्ध की कमान संभाल रहे थे।

- पूर्वी पाकिस्तान में फौज गैर-मुसलमानों को बना रही था निशाना।

- पाकिस्तान ने 3 दिसंबर को पश्चिमी फ्रंट पर किया हमला।

- 3 दिसंबर के हमले का जवाब भारत ने आपरेशन ट्राइडेंट शुरु करके दिया।

- 4 दिसंबर 1971 को भारत की तीनों सेनाओं ने आपरेशन ट्राइडेंट शुरू किया।

- भारतीय सेना ने पश्चिमी और पूर्वी फ्रंट दोनों तरफ खोला मोर्चा।

- भारतीय नौसेना ने भी युद्ध के दो मोर्चे संभाल रखे थे।

- एक था बंगाल की खाड़ी और दूसरा पश्चिमी पाकिस्तान में अरब सागर।

- भारतीय वायुसेना के हंटर और मिग-21 ने दोनों फ्रंट पर एक साथ किया हमला।

- 1971 में भारत पू्र्वी फ्रंट पर भारत की ताकत 5 लाख सैनिक थे।

- बांग्लादेश की मुक्तिवाहिनी सेना के 1 लाख 75 हजार जवान भी साथ थे।

- पूर्वी पाकिस्तान में पाक सैनिकों की तादात  3 लाख 65 हजार थी।

- 13 दिन चली जंग और पाकिस्तान ने डाले हथियार।

- तीन दिन में ही पाक एयर फोर्स और नेवल विंग को तबाह कर दिया गया।

- पूर्वी पाकिस्तान की राजधानी ढाका में भारतीय पैराट्रूपर्स आसानी से उतर गए

- जनरल नियाजी को  भारतीय पैराट्रूपर्स के उतरने का पता 48 घंटे बाद लगा।

- 9 हजार पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे, पाक फौजों को काफी नुकसान हुआ।

- भारत और  मुक्तिवाहिनी सेना के 3,800 सैनिक शहीद हुए।

बांग्लादेश में पाकिस्तान सेना का हुआ था भारी नुकसान...

- पूर्वी पाकिस्तान में दस से तीस लाख लोगों की मौत हुई।

- पाकिस्तानी लेखक तारिक अली के ने छापी थी तबाही की डिटेल।

- पाक की आधी नौसेना, एक चौथाई वायुसेना और एक तिहाई थलसेना तबाह हुई।

- भारत में करीब 93 हजार लोग बंदी बनाए गए, जिनमें पाक सैनिक और नागरिक शामिल थे।

- दूसरे विश्व युद्ध के बाद किसी सेना का यह सबसे बड़ा समर्पण था।

- इस युद्ध में पाकिस्तान को कुल 63 विमानों का नुकसान हुआ था।

- 9 हजार पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे, पाक फौजों को काफी नुकसान हुआ।

- 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने सरंडर किया।

पाकिस्तान के सरेंडर की कहानी

3 दिसंबर 1971 को इंदिरा गांधी कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं। शाम के ठीक 5.40 हुए थे पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर के सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए। इंदिरा गांधी ने तुरंत दिल्ली वापस लौटने का फैसला किया। दिल्ली में ब्लैक आउट होने के कारण 11 बजे वह पालम हवाई अड्डे उतरी। तुरंत मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाई गई। जिसके बाद उन्होंने देश को संबोधित किया। युद्ध शुरू हो चुका था। पश्चिमी फ्रंट के ज्यादा पूर्वी फ्रंट की लड़ाई अहम मानी जा रही थी। जो पाकिस्तान के लिए निर्णायक साबित होने वाली थी। जनरल मानेकशॉ ने पूर्वी कमान के स्टाफ ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब को फोन कर तुरंत पूर्वी फ्रंट खोलने को कहा। आश्चर्य की बात थी कि पूरे युद्ध में मानेकशॉ खुलना और चटगांव पर ही कब्जा करने पर जोर देते रहे और ढाका पर कब्जा करने का लक्ष्य भारतीय सेना के सामने रखा ही नहीं गया। इसकी बात पुष्टि जनरल जैकब ने की थी, "वास्तव में 13 दिसंबर को जब हमारे सैनिक ढाका के बाहर थे, हमारे पास कमान मुख्यालय पर संदेश आया कि इस-इस समय तक पहले वह उन सभी नगरों पर कब्जा करे जिन्हें वह बाईपास कर आए थे। अभी भी ढाका का कोई जिक्र नहीं था। यह आदेश हमें उस समय मिला जब हमें ढाका की इमारतें साफ नजर आ रही थीं"।

गवर्नर हाउस पर 30 मिनट की बमबारी ने बदल दिया युद्ध का रूख...

14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर 11 बजे ढाका के गवर्नर हाउस में एक महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है। गवर्नर एएम मलिक अपने मंत्रिमंडल के साथियों से बैठक करने वाले हैं। बैठक में पाकिस्तानी प्रशासन के चोटी के अधिकारी भाग लेने वाले हैं। सेना ने तय किया कि उसी समय भवन पर बम गिराए जाएंगे। गवर्नर हाउस पर भारतीय वायुसेना ने 30 मिनट तक लगातार तीन हमले किए।

  • - विंग कमांडर बीके बिश्नोई की फाइटर टीम का हमला- विंग कमांडर बिश्नोई की टीम के हर पायलट ने पहले राउंड में 16 रॉकेट दागे, चार मिग 21 विमानों ने धुएं और धूल के ग़ुबार से घिरे गवर्नर हाउस पर 128 रॉकेट गिराए।
  • - फ्लाइट लेफ्टिनेंट जी बाला की फाइटर टीम का हमला-  जैसे ही वो वहाँ से हटे, फ्लाइट लेफ्टिनेंट जी बाला के नेतृत्व में 4 स्कवॉड्रन के दो और मिग 21 वहां बमबारी करने पहुंच गए। उन्होंने गवर्नर हाउस के दो चक्कर लगाए और हर बार चार चार रॉकेट भवन पर दागे। गवर्नर हाउस पर मिग 21 के 6 हमलों में 192 रॉकेट दागे गए।
  • - विंग कमांडर एसके कौल की फाइटर टीम का हमला- जैसे ही पाकिस्तानी अधिकारियों को लगा सब ठीक हो गया है। तभी विंग कमांडर एसके कौल की टीम ने हमला कर दिया। छत, टैरेस, बालकनी, खिड़की और दरवाजे सब ढह गए। इस हमले से गवर्नर एएम मलिक इतना डर गए कि उन्होंने हमले के दौरान ही इस्तीफा दे दिया था।

जनरल नियाजी ने किया सरेंडर...

दूसरी तरफ ढाका के बाहर मीरपुर ब्रिज पर मेजर जनरल गंधर्व नागरा अपनी टीम के साथ पहुंच गए थे। वहीं से उन्होंने जनरल नियाजी के नाम एक नोट लिखा- प्रिय अब्दुल्लाह, मैं यहीँ पर हूं, खेल खत्म हो चुका है, मैं सलाह देता हूं कि तुम मुझे अपने आप को सौंप दो और मैं तुम्हारा ख्याल रखूंगा। 16 दिसंबर की सुबह 9.25 बजे लेफ्टिनेंट जनरल जैकब को जनरल मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुंचें। जब जैकब जब पाकिस्तानी सेना के मुख्यालय पहुंचें, तो उन्होंने देखा जनरल नागरा नियाजी के पास पहले से ही मौजूद हैं। जनरल जैकब ने नियाजी को आत्मसमर्पण की शर्तें पढ़ कर सुनाई। नियाजी की आंखों से आंसू बह रहे थे। जनरल नियाजी ने शुरू में आनाकानी की। लेकिन जनरल जैकब ने कहा, मैं आपको फैसला लेने के लिए 30 मिनट का समय देता हूं, अगर आप समर्पण नहीं करते तो मैं ढाका पर बमबारी दोबारा शुरू करने का आदेश दे दूंगा। उधर पूर्वी कमान के कमांडर इन चीफ जगजीत सिंह अरोड़ा अपने दलबदल समेत एक दो घंटे में ढाका लैंड करने वाले थे। 30 मिनट बाद जैकब जब नियाजी के कमरे में घुसे तो वहां सन्नाटा छाया हुआ था। आत्मसमर्पण का दस्तावेज मेज पर रखा हुआ था। जैकब ने नियाजी से पूछा क्या वह समर्पण स्वीकार करते हैं? नियाजी ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने यह सवाल तीन बार दोहराया। नियाजी फिर रोने लगे। जैकब नियाजी को फिर कोने में ले गए और उन्हें बताया कि समर्पण रेस कोर्स मैदान में होगा। नियाजी ने इसका विरोध किया, लेकिन नियाजी सब कुछ गंवा चुके थे और ऐसी धरती पर थे जहां अगर भारतीय सेना नहीं होती तो शायद उनकी मुक्तिवाहिनी सेना उसकी बोटी-बोटी कर देती।

तलवार की जगह, पिस्टल देकर किया सरेंडर...

मेजर जनरल गंधर्व नागरा ने नियाजी को एक साइड में ले जा कर कहा कि अब्दुल्ला तुम एक तलवार सरेंडर करो, तो वह कहने लगे पाकिस्तानी सेना में तलवार रखने का रिवाज नहीं है। तो फिर मैंने कहा कि तुम सरेंडर क्या करोगे? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं है। फिर सलाह दी कि तुम एक पिस्टल लगाओ ओर पिस्टल उतार कर सरेंडर कर देना।

जनरल नियाजी को बचाया मुक्तिवाहिनी सेना से...

चार बजे नियाजी और जैकब जनरल अरोड़ा को लेने ढाका हवाई अड्डे पहुंचे। रास्ते में जैकब को भारतीय सैनिकों की टुकड़ी दिखाई दी। उन्होंने कार रोक कर उन्हें अपने पीछे आने के लिए कहा। उधर मुक्तिवाहिनी सेना के मेजर जनरल टाइगर सिद्दीकी एयरपोर्ट पहुंच गए। जैकब को कुछ खतरे की बू आई। उन्होंने वहां मौजूद भारतीय सैनिकों से कहा कि वह नियाजी को कवर करें और सिद्दीकी की तरफ अपनी राइफलें तान कर रखें। जैकब ने विनम्रता पूर्वक सिद्दीकी से कहा कि वह हवाई अड्डे से चले जाएं। सिद्दीकी टस से मस नहीं हुआ। जैकब ने अपना अनुरोध दोहराया। सिद्दीकी ने तब भी कोई जवाब नहीं दिया। जैकब ने तब चिल्ला कर कहा कि वह फौरन अपने समर्थकों के साथ हवाई अड्डा छोड़ कर चले जाएं। सिद्दीकी धबराया और वहां से चला गया।

रेसकोर्स मैदान पर हुआ ऐतिहासिक सरेंडर, बांग्लादेश का जन्म...

4 बजे जेएस अरोड़ा अपने दल बल के साथ पांच एमक्यू हेलिकॉप्टर्स से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे। फिर वहां से रेसकोर्स मैदान पहुंचे। 4.31 बजे जनरल जेएस अरोडा और नियाजी एक मेज के सामने बैठे और दोनों ने आत्म समर्पण के दस्तवेज पर हस्ताक्षर किए। नियाजी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया। बाकि पाकिस्तान के सैनिकों ने अपने हथियार भारतीय सेना के सामने समर्पण कर दिए। समर्पण करने वालों में 54,154 पाकिस्तानी सेना के जवान, 1381 पाकिस्तानी नौसेना के जवान, 833 पाकिस्तानी वायुसेना के जवान, 22 हजार अर्धसैनिक बलों के जवान और 12 हजार आम पाकिस्तानी नागरिक थे। आत्मसमर्पण के वक्त नियाजी की आंखें एक बार फिर नम हो गई थी। अंधेरा हो रहा था। वहां पर मौजूद भीड़ चिल्लाने लगी। वह लोग नियाजी के खून के प्यासे थे। किसी तरह वरिष्ठ अफसरों ने नियाजी के चारों तरफ घेरा बनाकर उसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया।  ठीक उसी वक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा में ऐलान किया- ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है।