100 दिनः बैंक-व्यवसाय और रोजगार के मोर्चे पर कहां खड़ी है मोदी सरकार

न्यूज 24 ब्यूरो, नई दिल्ली (9 सितंबर): पीएम मोदी ने जब दूसरी बार सत्ता संभाली थी तो उस वक्त शायद इस बात का अंदाजा नहीं था कि मंदी और औद्योगिक सुस्ती का सामना इतनी जल्दी करना पड़ जायेगा। बैंकों की गिरती हालत और घटते रोजगारों ने मोदी सरकार को बचाव की मुद्रा में खड़ा कर दिया है। हालांकि, इस दौरान सरकार ने सदन में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। श्रम सुधार, तीन तलाक और कश्मीर जैसे मुद्दे पर गंभीर और ठोस कदम उठा कर मजबूत सरकार के संकेत दिये लेकिन आर्थिक मंदी सरकार के सामने सुरसा की तरह खड़ी हुई है। सौ दिन पूरे होने पर मोदी सरकार की प्राथमिकता देश के लोगों को इस  बात का विश्वास दिलाना होगा कि आर्थिक और औद्योगिक मंदी जल्दी खत्म होगी। बैंकों की हालत सुधरेगी और एक बार फिर रोजगार पैदा होंगे।  

प्रधानमंत्री मोदी ने इसी साल 30 मई को जब दूसरी बार सत्ता संभाली थी तो अगले 15 दिनों के अंदर तीन कैबिनेट मीटिंग कर संकेत दे दिया था कि इस बार 'हनीमून पीरियड' नहीं होगा, पहले ही दिन से सभी को काम पर जुटना होगा और नतीजे देने होंगे। दूसरे कार्यकाल की खास बात यह है कि सरकार विचारधारा से जुड़े मुद्दों पर आगे बढ़ने का इरादा रखती है, जिनपर पिछले कार्यकाल में आगे बढ़ने से हिचक दिखाई थी। दूसरे कार्यकाल के पहले 100 दिन बहुत ही घटना प्रधान रहे हैं। अब अगले 100 दिन में सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को संभालने की चुनौती है तो कश्मीर में 'मिशन नॉर्मल' पर फोकस होगा।

अगले 100 दिनों में सरकार के लिए सबसे बड़ा अजेंडा होगा आर्थिक मोर्चे पर मंदी की आहट को दूर करना। पिछले 6 साल के सबसे कमजोर जीडीपी विकास दर भी इसी 100 दिन में सामने आई। तमाम सेक्टर में मंदी की आहट आई है, जिसे काउंटर करने के लिए सरकार ने कुछ अहम फैसले लिए। बैंकों का विलय किया। लेकिन अभी सरकार को अगले 100 दिनों में इस समस्या से जूझना है। सुस्ती को दूर करने के लिए सरकार को हर मुमकिन कोशिश करनी होगी। सरकार को पता है कि आर्थिक मोर्चे पर कामयाब न होने से जनता का विश्वास खोने का खतरा बढ़ जाएगा।

जम्मू-कश्मीर में अगर आर्टिकल 370 को हटाने का फैसला 100 दिनों के गवर्नेंस का सबसे बड़ा फैसला था तो अगले 100 दिन वहां हालात को सामान्य करना अहम अजेंडा होगा। सरकार को पता है कि अगर हालात सामान्य हो गए तो इतिहास में किसी भी सरकार के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा दांव होगा, जो सफल होगा और अगर ऐसा नहीं होता है तो उसके कुछ नकारात्क प्रभाव भी हैं। राज्य के किसी भी हिस्से पर बहुत दिनों तक फोर्स का पहरा नहीं बैठाया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट में राममंदिर मुद्दे पर सुनवाई अपने अंतिम दौर में है। राममंदिर मुद्दे पर जब कानून लाने का दबाव बढ़ा तो सरकार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक इंतजार करने का आश्वासन देना पड़ा है। अब जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने में बहुत ज्यादा दिन बचे नहीं हैं तो देखना दिलचस्प होगा कि फैसले के अनुसार सरकार आगे का मार्ग कैसे प्रशस्त करती है। सरकार के सामने दो तरह की स्थितियां संभावित होंगी। दोनों ही स्थितियों में उसकी प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होगी।

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