मनमोहन सिंह का पीएम मोदी पर तीखा हमला, नोटबंदी को बताया 'विशाल त्रासदी'

नई दिल्ली ( 9 दिसंबर ): पूर्व प्रधानमंत्री और राज्यसभा सांसद डॉ मनमोहन सिंह ने बेहद आलोचनात्मक शब्दों में नोटबंदी की आलोचना की है। मनमोहन सिंह ने कहा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का फैसला कर अपने मौलिक कर्तव्यों का उपहास उड़ाया है और एक अरब से ज़्यादा भारतीयों का विश्वास तोड़ा है। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह का ये विचार शुक्रवार को अंग्रेज़ी दैनिक में प्रकाशित हुआ है।

डॉ सिंह द्वारा लिखे गए आलेख में'विशाल त्रासदी की रचना' में कहा गया है कि नोटबंदी की वजह से जीडीपी और नौकरियों के सृजन में काफी दूर तक प्रभाव पड़ेगा और आने वाले महीनों में 'बेवजह' कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। इस फैसले की वजह से ईमानदार हिन्दुस्तानियों को 'भारी नुकसान' होगा और बेईमान और काला धन जमा करने वाले 'हल्की-सी चोट के बाद' बच निकलेंगे।

24 नवंबर को पूर्व प्रधानमंत्री तथा जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ मनमोहन सिंह ने संसद में बोलते हुए नोटबंदी के फैसले को 'संगठित लूट, कानूनी लूट' बताई थी। उनका शुक्रवार को प्रकाशित संपादकीय इन्हीं विचारों को विस्तार से समझाता है

डॉ सिंह ने अपने आलेख में लिखा, "बिना सोच-समझे किए गए एक ही फैसले से प्रधानमंत्री ने करोड़ों भारतीयों की आस्था और उस विश्वास को चकनाचूर कर दिया है, जो उन्होंने उनकी और उनके धन की रक्षा करने के लिए भारत सरकार में दर्शाया था।"

पूर्व प्रधानमंत्री के अनुसार, "यह प्रत्यक्ष है कि रातोंरात अचानक लागू की गई नोटबंदी से करोड़ों भारतीय उपभोक्ताओं के विश्वास को ठेस पहुंची है और इससे गंभीर आर्थिक जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।  अधिसंख्य भारतीयों की ईमानदारी की कमाई को रातोंरात खत्म कर दिए जाने और अब नए नोटों तक उनकी सीमित पहुंच के घाव मिलकर बहुत गहरे हो गए हैं और जल्द नहीं भर पाएंगे।"

उन्होंने कर चोरी रोकने और आतंकवादियों द्वारा नकली नोटों के इस्तेमाल को खत्म करने की प्रधानमंत्री की मंशा को सम्माननीय बताया है और कहा कि उसके लिए खुले दिल से उन्हें समर्थन दिया जाना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी लिखा कि यह गलतफहमी है कि 'सारी नकदी काला धन है, और सारा काला धन नकदी के रूप में ही है।'

डॉ सिंह ने लिखा कि 90 फीसदी से अधिक भारतीय कामगारों को आज भी नकदी में ही वेतन हासिल होता है। डॉ सिंह ने लिखा, "इसे 'काले धन' के रूप में बदनाम करना और करोड़ों गरीब भारतीयों की ज़िन्दगियों को बेतरतीबी में धकेल देना एक विशाल त्रासदी है।

उन्होंने लिखा है कि ज़्यादातर भारतीय नकदी में कमाते हैं, नकदी में लेनदेन करते हैं और नकदी में ही बचत भी करते हैं और सब कुछ जायज़ तरीके से यह किसी भी संप्रभुता संपन्न देश की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार की आधारभूत ज़िम्मेदारी है कि वह अपने नागरिकों कि ज़िन्दगियों और उनके अधिकारों की रक्षा करे। "