संसदीय समिति का कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल, जजों की नियुक्ति के लिए न्यायपालिका-कार्यपालिका में सहमति जरूरी

नई दिल्ली (8 दिसंबर): उच्च न्यायापालिक में जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम सिस्टम और उसके एकाधिकार को लेकर लोक शिकायत और कानून न्याय संबंधित विभाग की स्थाई समिति ने सवाल उठाए हैं। समिति के मुताबिक उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति न्यायपालिका और कार्यपालिका की सहमति से ही हो सकती है। साथ ही इस समिति का कहना है कि इसमें ये न्यापालिका और कार्यपालिका की जिम्मेदारी है कि वो आपसी सहमति से उच्च न्यायपालिका जजों की नियुक्ति करें।

इस समिति के मुताबिक संविधान में संशोधन से संबंधित मामले की सुनावाई कम से 11 जजों के बेंच द्वारा होना जाहिए, ताकि इसपर इस बड़ा नजरिया बन सके। साथ ही इस समिति का कहना है कि संविधान की व्याख्या कम से कम 7 जजों के बेंच द्वारा ही किया जाना चाहिए।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर के रिटायरमेंट को एक महीने से भी कम समय बचा है। इससे पहले टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने जजों की नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार की सभी सिफारिशों को स्थगित कर दिया है। पिछले सप्ताह इस कॉलेजियम की बैठक हुई।

चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर के रिटायर होने के बाद 3 जनवरी को सात जजों के पद रिक्त हो जाएंगे। इन्हीं 7 पदों के लिए सरकार ने अपनी सिफारिशें दी थी। कॉलेजियम ने इन सभी नामों को स्थगित कर दिया है। कॉलेजियम ने अपनी बैठक में फैसला लिया है कि 4 जनवरी को नए चीफ जस्टिस जगदीश सिंह खेहर इन नामों पर आखिरी मुहर लगाएंगे। चीफ जस्टिस खेहर के अलावा 3 जनवरी को इस कॉलेजियम में जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस मदन बी लोकोर भी शामिल होंगे।

जस्टिस चेलमेश्वर सितंबर से कॉलेजियम की बैठक में शामिल नहीं हो रहे हैं। जस्टिस चेलमेश्वर की शिकायत है कि कॉलेजियम में शामिल लोगों के विचारों और चर्चाओं का ठीक ढांचा तैयार नहीं किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति को लेकर पिछले कुछ समय केंद्र सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। इस वजह से जजों की नियुक्ति में भी जरूरत से ज्यादा समय लग रहा है। हालांकि कॉलेजियम के कुछ सदस्य लगातार जस्टिस चेलमेश्वर को बैठक में आने के लिए मनाने में लगे हैं। कॉलेजियम के सभी सदस्यों का मानना है कि उनके अनुभव और ज्ञान से सुप्रीम कोर्ट के लिए काबिल जजों को नियुक्त किया जा सकेगा।

कॉलेजियम ने ये सुझाव भी दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के लिए नियुक्त होने वाले जजों का कार्यकाल कम से कम पांच साल का होना चाहिए। ऐसा देखा गया है कि रिटायरमेंट से कुछ महीने पहले ही हाइकोर्ट के जजों को सुप्रीम कोर्ट के लिए नियुक्त किया जाता है। ज्यादातर जजों को 62 साल की उम्र में सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया जाता है। ऐसे में उन्हे सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ तीन साल ही मिल पाते हैं। तीन साल के कार्यकाल में बहुत से काबिल जजों को बेंच की अध्यक्षता करने का मौका भी नहीं मिल पाता। ये जूनियर जज के रूप में ही रिटायर हो जाते हैं। ये प्रक्रिया सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के लिए नियुक्त होने वाले जजों को काम करने के लिए कम से कम पांच साल का समय मिलना चाहिए ताकि उन्हे बेंच की अध्यक्षता करने का भी मौका मिल सके। अगस्त से कॉलेजियम में हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए मेमोरंडम ऑफ प्रोसीजर लंबित है। इस मुद्दे पर भी नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति के बाद ही फैसला हो सकेगा।