Tuesday, June 2, 2020

बिहार की ज्योति कुमारी के करतब देखकर ट्रंप की बेटी इंवाका ने भी दबा ली दांतों तले उंगली, देखें पूरी कहानी

इंवाका ट्रंप ने ज्योति कुमारी के फोटो पर लिखा है धैर्य और पिता-पुत्री का प्रेम और धैर्यपूर्ण साइकिलिंग अकल्पनीय है।

नई दिल्ली। कोरोना काल में न जाने कितने ऐसे लोग हैं जिन्होंने तमाम परेशानियां उठाई, हजारों किलोमीटर पैदल चले और अपने घर पहुंचे। ऐसे लोगों को रास्ते में कहीं कुछ मिल गया तो खा लिया और मिल गया तो पी लिया। बहुत ही कम लोग ऐसे रहे जिन पर मीडिया की निगाह पड़ी। हालांकि, मीडिया की नजर से जब सरकारों ने लॉकडाउन को तोड़कर घर जाते हुए लोगों को देखा तो उनके लिए ट्रेन और बसों का भी इंतजाम करवाया और वो पहुंचे लेकिन 15 साल की एक लड़की ज्योति गुरुग्राम से अपने घायल पिता को एक पुरानी साईकिल पर बैठाकर बिहार के दरभंगा पहुंच। लेकन पता चला है कि ज्योति  कुमारी के करतब  को देखकर बिहार के लोग ही नहीं बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की बेटी  इवांका ने भी दांतों तले उंगली दबा ली है। इवांका राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की बेटी और सरकारी एडवाइजर भी है। इवांका ज्योति के फोटो के साथ ट्वीट किया है।

इवांका ने ट्वीट कर कहा कि 15 साल की ज्योति कुमारी ने अपने जख्मी पिता को साइकिल से सात दिनों में 1,200 किमी दूरी तय करके अपने गांव ले गई। इवांका ने आगे लिखा कि सहनशक्ति और प्यार की इस वीरगाथा ने भारतीय लोगों और साइकलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

कोरोना संकट के कारण घोषित देशव्यापी लॉकडाउन में देश की अलग-अलग जगहों पर प्रवासी मजदूर फंस गए। ट्रेन सहित आवागमन के अन्य साधनों का परिचालन बंद होने के कारण हजारों मजदूर पैदल ही अपने-अपने घरों की ओर चल पड़े। चूंकि ज्योति के पिता मोहन पासवान कुछ महीने पहले हादसे में जख्मी हो गए थे, इसलिए वो अपने दम पर घर पहुंचने में असमर्थ थे।

लॉकडाउन में पिता के फंसे होने से बेटी ज्योति परेशान हो गई और एक दिन साइकिल उठाकर चल पड़ी पिता के साथ। ज्योति ने बताया कि उसने पापा को साइकिल पर बिठाकर 10 मई को गुरुग्राम से चलना शुरू किया और 16 मई की शाम घर पहुंच गई। रास्ते में उसे बहुत सारी समस्याओं का सामना करना पड़ा, हालांकि कुछ लोगों ने उनकी मदद भी की।

ज्योति के पिता गुरुग्राम में रहकर ऑटो चलाते थे। सड़क दुर्घटना में उनके घायल होने के बाद वह 30 जनवरी को मां के साथ गुरुग्राम गई थी। मां के गांव आने के बाद वह पिता की सेवा में लगी रही। इसी बीच मार्च के तीसरे सप्ताह में लॉकडाउन हो गया। कुछ दिनों में जमा-पूंजी खर्च हो गई तो कोई रास्ता न देख ज्योति ने साइकिल से घर लौटने का फैसला किया। पिता ने ज्योति की जिद पर पांच सौ में पुरानी साइकिल खरीदी। दिव्यांग पिता को उस पर बैठाकर 10 मई की रात गुरुग्राम से घर के लिए निकली। आठ दिन में घर पहुंची तो आस-पड़ोस के लोग दंग रह गए थे।

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