Wednesday, July 8, 2020

ICMR के शोध समूह का बड़ा खुलासा, कोरोना वायरस को खत्म करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है!

रिपोर्ट में कहा गया है, 'देश की घनी और मध्यम आबादी वाले क्षेत्रों में कोरोना वायरस संक्रमण के सामुदायिक प्रसार की पुष्टि हो चुकी है और इस स्तर पर कोविड-19 को खत्म करना अवास्तविक जान पड़ता है।

नई दिल्ली। कोरोना वायरस को लेकर एक बहुत ही खतरनाक और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। एम्स दिल्ली के डॉक्टरों और आईसीएमआर के शोध समूह का कहना है कि देश की घनी और मध्यम घनी आबादी वाले इलाकों में कोविड-19 यानी कोरोना वायरस का कम्युनिटी ट्रांसमिशन हो चुका है। हालांकि सरकार ने अभी तक कम्युनिटी ट्रांसमिशन की बात स्वीकार नहीं की है। सोमवार तक देश में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या 1लाख 90 हजार 535 हो चुकी है। ध्यान रहे, कोरोना के कम्युनिटी ट्रांसमिशन की जानकारी वाली रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को सोंपी गयी है। यह रिपोर्ट आईपीएच (भारतीय लोक स्वास्थ्य संघ), आईएपीएसएम (इंडियन एसोसिएशन ऑफ प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन) और आईएई (भारतीय महामारी विद संघ) ने संयुक्त रूप से तैयार की है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘देश की घनी और मध्यम आबादी वाले क्षेत्रों में कोरोना वायरस संक्रमण के सामुदायिक प्रसार की पुष्टि हो चुकी है और इस स्तर पर कोविड-19 को खत्म करना अवास्तविक जान पड़ता है।

रिपोर्ट के अनुसार, ‘राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन महामारी के प्रसार को रोकने और प्रबंधन के लिए प्रभावी योजना बनाने के लिए किया गया था ताकि स्वास्थ्य सेवा प्रणाली प्रभावित न हो। यह संभव हो रहा था लेकिन नागरिकों को हो रही असुविधा और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयास में चौथे लॉकडाउन में दी गई राहतों के कारण यह प्रसार बढ़ा है।’

कोविड कार्य बल के 16 सदस्यीय संयुक्त समूह में आईएपीएसएम के पूर्व अध्यक्ष और एम्स दिल्ली में सामुदायिक चिकित्सा केंद्र के प्रमुख डॉ शशि कांत,आईपीएचए के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सीसीएम एम्स के प्रोफेसर डॉ संजय के राय, सामुदायिक चिकित्सा,आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी के पूर्व प्रोफेसर और प्रमुख डॉ डीसीएस रेड्डी, डीसीएम और एसपीएच पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के पूर्व प्रोफेसर और प्रमुख डॉ राजेश कुमार शामिल हैं।

भारत सरकार ने महामारीविदों से परामर्श लिया होता जिन्हें अन्य की तुलना में इसकी बेहतर समझ होती है तो शायद बेहतर उपाय किये जाते।’ विशेषज्ञों ने कहा, ऐसा लगता है कि मौजूदा सार्वजनिक जानकारी के आधार पर सरकार को चिकित्सकों और अकादमिक महामारी विज्ञानियों द्वारा सलाह दी गई थी। उन्होंने कहा, ‘नीति निर्माताओं ने स्पष्ट रूप से सामान्य प्रशासनिक नौकरशाहों पर भरोसा किया जबकि इस पूरी प्रक्रिया में महामारी विज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, निवारक चिकित्सा और सामाजिक वैज्ञानिकी क्षेत्र के विशेषज्ञों की भूमिका काफी सीमित थी।’ विशेषज्ञों ने कहा कि भारत इस समय मानवीय संकट और महामारी के रुप में भारी कीमत चुका रहा है।

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