मठों और मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की क़ानूनी लड़ाई, सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में आज मठों और मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने वाली याचिका पर अहम सुनवाई होनी है।

नई दिल्ली: मठों और मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट आज सुनवाई करेगा। याचिका में मांग की गई है कि जैसे मुस्लिमों और ईसाईयों द्वारा अपने धार्मिक स्थलों, प्रार्थना स्थलों का प्रबंधन बिना सरकारी दखल के किया जाता वैसे ही हिंदू, जैन, बौद्ध और सिखों को भी अपने धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन और प्रशासन का अधिकार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा है कि धर्मनिरपेक्ष देश में जब संविधान किसी भी तरह के धार्मिक भेदभाव की मनाही करता है तब पूजा स्थलों के प्रबंधन को लेकर भेदभाव क्यों होना चाहिए? मस्जिद, दरगाह और चर्च पर जब सरकारी नियंत्रण नहीं है तो मठों-मंदिरों, गुरुद्वारों पर सरकार का नियंत्रण क्यों?

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याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 26 के उल्लंघन के रूप में मंदिरों और मठों को मिलने वाले अनुदान को विनियमित करने के लिए सभी राज्यों द्वारा बनाए गए कानूनों को रद्द करने की भी मांग की गई है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यह विनियमन या तो सभी धर्मों के लिए होना चाहिए या केवल हिंदुओं के लिए विनियमन बंद होना चाहिए।

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि यह व्यवस्था तो बहुत लंबे समय से चली आ रही है, फिर अब इसे चुनौती क्यों दी गयी है। तब याचिका के समर्थन में दलील दी गयी कि सरकारी नियंत्रण की वजह से मंदिरों और मठों की स्थिति दिनोंदिन खराब होती जा रही है। मंदिरों- मठों की संपत्ति का उचित प्रबंधन नहीं होने से इनके पास धनाभाव हो गया है। भारी संख्या में मंदिर और मठ बंद हो गए हैं। याचिकाकर्ता के वकील गोपाल शंकर नारायण ने कर्नाटका का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य में करीब 15 हज़ार मंदिर बंद हो गए, क्योंकि उनके पास मैनेजमेंट के लिए पैसा नहीं था। हालाँकि जब सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि इस आँकड़े का आधार क्या है तो गोपाल शंकर नारायण का जवाब था कि इस दावे के पक्ष में उनके पास कोई ठोस साक्ष्य नहीं है।

एक अनुमान के मुताबिक देश के 15 राज्यों में करीब चार लाख मंदिरों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकारी नियंत्रण है। हिंदू संगठन इसका लगातार विरोध करते हैं। हाल ही में तमिलनाडु के मंदिरों में अर्चक यानी पुजारी की नियुक्ति को लेकर एक वाद सुप्रीम कोर्ट में आया है। मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के तुरंत बाद एमके स्टालिन ने विभिन्न मंदिरों में गैर-ब्राह्मणों को पुजारी के रूप में नियुक्त करने का आदेश जारी किया था। जिसे सुप्रीम कोर्ट में यह कहकर चुनौती दी गयी है कि यह जन्म के आधार पर वैदिक मंदिरों में पुजारी नियुक्त करने की परंपरा पर हमला करता है, जो ब्राह्मण समुदाय का एक विशेष संरक्षण है।

सुप्रीम कोर्ट हिंदू मंदिरों पर सरकारी कब्जे को कई मौकों पर अनुचित कह चुका है। 2019 में पुरी के जगन्नाथ मंदिर मामले में जस्टिस ( रिटायर्ड) बोबडे ने कहा था, ‘मैं नहीं समझ पाता कि सरकारी अफसरों को क्यों मंदिर का संचालन करना चाहिए?’ उन्होंने तमिलनाडु का उदाहरण दिया कि सरकारी नियंत्रण के दौरान वहां अनमोल देव-मूर्तियों की चोरी की अनेक घटनाएं होती रही हैं। ऐसी स्थितियों का कारण भक्तों के पास अपने मंदिरों के संचालन का अधिकार न होना है। सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में तमिलनाडु के प्रसिद्ध नटराज मंदिर पर सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का आदेश दिया था।

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सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में दो बातें कही गयीं हैं। या तो हिंदुओं, बौद्ध और सिख धर्म के धार्मिक स्थलों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करो या मुस्लिमों और ईसाईयों के धार्मिक स्थलों पर भी नियंत्रण करो। याचिकाकर्ता को भलीभांति पता है कि दूसरी माँग व्यवहारिक नहीं है लेकिन इसके सहारे पहली माँग को जायज ठहराया जा सकता है।

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