Monday, July 6, 2020

Vat Savitri Vrat 2020: वट सावित्री का व्रत आज, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

आज वट सावित्री का व्रत है।इस दिन  महिलाएं, ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस, वट वृक्ष का पूजन करके तीन दिवसीय व्रतानुष्ठान करती हैं। यह व्रत स्त्रियों के वैधव्यादि  दोषों के निराकरण एवं पुत्र व पति आदि के सुख, सुरक्षा ओैर सौभाग्य के लिए विशेष प्रशस्त माना जाता है।

मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिर्विद्, नई दिल्ली: आज 22 मई और ज्येष्ठ महीने की अमावस्या है। मई के महीने में ज्योतिष एवं धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन ज्येष्ठ अमावस, भावुका अमावस, वट सावित्री व्रत तथा शनि जयंती चार चार पर्व, एक साथ पड़ रहे हैं। ज्येष्ठ भावुका अमावस को श्री गंगा आदि तीर्थों पर स्नान, दान, जप, पितृपूजन, ब्राहमण भोजन, आदि कृत्यों का विशेष माहात्मय होता है।

आज वट सावित्री का व्रत है।इस दिन  महिलाएं, ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि से अमावस, वट वृक्ष का पूजन करके तीन दिवसीय व्रतानुष्ठान करती हैं। यह व्रत स्त्रियों के वैधव्यादि  दोषों के निराकरण एवं पुत्र व पति आदि के सुख, सुरक्षा ओैर सौभाग्य के लिए विशेष प्रशस्त माना जाता है। बरगद का पेड़ चिरायु होता है। अतः इसे दीर्घायु का प्रतीक मानकर परिवार के लिए इसकी पूजा की जाती है। हालांकि लॉकडाउन की वजह से महिलाएं इस बार पारंपरिक तरीके से बरगद के पेड़ के नीचे पूजा नहीं कर पाएंगी।

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन ही माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और श्रद्धा से यमराज द्वारा अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। अतः इस व्रत का महिलाओं के बीच विशेष महत्व बताया जाता है। महिलाएं भी इसी संकल्प के साथ अपने पति की आयु और प्राण रक्षा के लिए व्रत रखकर पूरे विधि विधान से पूजा करती हैं। इस दिन वट (बड़, बरगद) का पूजन होता है। इस व्रत को स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने की मंगलकामना से करती हैं।

शुभ मुहूर्त

 वट सावित्री व्रत की तिथि: 22 मई 2020
अमावस्‍या तिथि प्रारंभ: 21 मई 2020 को रात 9 बजकर 35 मिनट से
अमावस्‍या तिथि समाप्‍त: 22 मई 2020 को रात 11 बजकर 8 मिनट तक

वट सावित्री व्रत पूजा विधि…

  • बांस की टोकरी में सप्त धान्य भरकर ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें।
  • ब्रह्मा के वाम पार्श्व में सावित्री की मूर्ति स्थापित करें।
  • इसी प्रकार दूसरी टोकरी में सत्यवान तथा सावित्री की मूर्तियों की स्थापना करें। इन टोकरियों को वट वृक्ष के नीचे ले जाकर रखें।
  • इसके बाद ब्रह्मा तथा सावित्री का पूजन करें।
  • अब सावित्री और सत्यवान की पूजा करते हुए बड़ की जड़ में पानी दें।
  • पूजा में जल, मौली, रोली, कच्चा सूत, भिगोया हुआ चना, फूल तथा धूप का प्रयोग करें।
  • जल से वटवृक्ष को सींचकर उसके तने के चारों ओर कच्चा धागा लपेटकर तीन बार परिक्रमा करें।
  • बड़ के पत्तों के गहने पहनकर वट सावित्री की कथा सुनें।
  • भीगे हुए चनों का बायना निकालकर, नकद रुपए रखकर अपनी सास के पैर छूकर उनका आशीष प्राप्त करें।
  • पूजा समाप्ति पर ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि वस्तुएं बांस के पात्र में रखकर दान करें।
  • इस व्रत में सावित्री-सत्यवान की पुण्य कथा का श्रवण करना न भूलें। यह कथा पूजा करते समय दूसरों को भी सुनाएं।

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