#ElectionResults: यूपी में मोदी 'सुनामी' में कैसे बह गए साइकिल, पंजा और हाथी, जानिए

देश | March 11, 2017, 10:47 a.m.

नई दिल्ली (11 मार्च): उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटों के नतीजों से साबित हो गया कि यूपी में मोदी की लहर नहीं बल्कि 'सुनामी' आई है। इस सुनामी ने उत्तर प्रदेश में जहां एक ओर बीजेपी का 14 साल का सूखा खत्म कर दिया है। वहीं इस सुनामी में साइकिल, पंजा और हाथी सब बह गए हैं। 403 में से 322 सीटों पर बीजेपी गठबंधन आगे हैं। समाजवादी पार्टी 50, बसपा 19 और कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट रही है। सपा कांग्रेस गठबंधन की करारी हार से गठबंधन के नेता चिंतन में लगे हुए हैं कि आखिर इतनी कम सीटों की वजह क्या रही? आखिर मोदी लहर कैसे बह गए साइकिल, पंजा और हाथी आइए जानते हैं क्या रहे कारण-


1) सपा की पारिवारिक कलह- हार के पीछे सबसे बड़ी वजह चुनाव से ठीक पहले मुलायम कुनबे में मचा कोहराम माना जा रहा है। चाचा शिवपाल और भतीजे अखिलेश से शुरू हुई पारिवारिक कलह समाजवादी पार्टी में फूट और फिर तोड़फोड़ का सबसे बड़ा कारण बन गई। जहां एक तरफ पार्टी के सर्वेसर्वा मुलायाम सिंह यादव उनके भाई शिवपाल यादव और अमर सिंह साथ खड़े दिखे तो वहीं दूसरी तरफ वहीं सपा के थिंक टैंक रामगोपाल यादव और नरेश अग्रवाल अखिलेश के साथ नजर आए। इस विवाद में पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान हर समय दोनों खेमों के बीच सुलह कराते ही नजर आए। मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा और आखिरकार शिवपाल यादव खेमे की हार हुई और चुनाव चिन्ह अखिलेश को मिला। लेकिन इस पूरे प्रकरण में पार्टी के कैडर और जनता के बीच इसका गलत संदेश पहुंचा, जिसका नतीजा आपके सामने है। यूपी में बीजेपी को दो तिहाई से ज्यादा बहुमत मिल रहा है।


2) सपा का कमजोर संगठन- समाजवादी पार्टी में दो फाड़ होने के बाद अखिलेश ने विधायकों की संख्या के दम पर चाचा शिवपाल से पार्टी का प्रतिनिधित्व तो जीत लिया लेकिन प्रचार के दौरान संगठन के रूप में पार्टी काफी कमजोर नजर आई। पिता और चाचा के मना करने के बाद भी अखिलेश ने कांग्रेस से गठबंधन किया। पिता और चाचा के वफादार पार्टी के कई पुराने नेताओं के टिकट काटे। जिससे पार्टी का बड़ा खेमा अखिलेश से अलग हो गया। हर जगह पार्टी के प्रचार के लिए अखिलेश और डिंपल यादव ही प्रचार का प्रमुख चेहरा बने रहे। मुलायम सिंह लगभग प्रचार से दूरे रहे। बाकि 296 सीटों पर सपा अखिलेश के भरोसे थी, अकेले अखिलेश को 221 रैलियां करनी पड़ी। जाहिर है पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के आभाव में लड़ना अखिलेश के लिए आसान नहीं रहा।


3) कांग्रेस से गठबंधन बड़ी भूल- अखिलेश का राहुल के साथ हाथ मिलाना सबसे बड़ी चूक माना जा रहा है। सपा-कांग्रेस गठबंधन मिलकार 403 सीटों पर चुनाव लड़ा। सपा ने 298 और कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा। लेकिन जनता ने सपा-कांग्रेस गठबंधन को बुरी तरह नकार दिया। यहां तक की गठबंधन को अवसरवादी गठजोड़ कहा गया क्योंकि गठबंधन से पहले कांग्रेस नारा दे रही थी 27 साल यूपी बेहाल। अखिलेश सरकार के कामकाज पर आरोप लगाए जा रहे थे। उसी कांग्रेस से अखिलेश ने हाथ मिला लिया। इससे पार्टी कैडर में गलत संदेश गया। दूसरी तरफ सपा के कई नेताओं के टिकट काटे गए। जिससे पुराने सपा कार्यकर्ता नाराज हो गए। मुलायम सिंह बार-बार कहते रहे कि गठबंधन सही नहीं है, बावजूद अखिलेश ने नहीं सुनी और आखिरकार नतीजा सबसे सामने है।


4) यूपी में खराब कानून-व्यवस्था मुद्दा- 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो मुलायम सिंह ने अपनी जगह अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनवाया। अखिलेश ने सपा की गुंडों की पार्टी वाली छवि को सुधारने की पूरी कोशिश करते हुए दागी नेताओं से दूरी बनाए रखी, अखिलेश ने ऐसे लोगों को न तो सरकार में जगह दी, न ही पार्टी में। लेकिन कई बार मुलायम सिंह और शिवपाल के हस्तक्षेप के चलते उन्हें अपने फैसले वापस लेने पड़े। नतीजा ये रहा कि यूपी में कानून-व्यवस्था की हालत लगातार खराब होती रही। यूपी में सांप्रदायिक हिंसा, रेप और लूटपाट की वारदातों में भी इजाफा हुआ। राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था ने अखिलेश के विकास कार्यों को भी घूमिल करने का काम किया।


5) पारंपरिक वोट बैंक का खिसकना- मुलायम सिंह के अध्यक्ष रहने तक समाजवादी पार्टी से पिछड़ा और मुस्लिम वोटर जुड़ा रहा। अखिलेश के अध्यक्ष बनने और सपा के अंतर कलह के चलते कहीं न कहीं पिछड़े और गरीब तबके ने अखिलेश में अपना नेतृत्व नहीं देखा। वहीं सपा का पारंपरिक वोटर माने जाने वाला मुस्लिम समाज इस बार के सपा के कार्यकाल से खासा नाराज दिखा। उसका एक बड़ा कारण है कि अखिलेश राज में यूपी में 200 से ज्यादा जगहों पर सांप्रदायिक दंगे हुए। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी ने सपा के बैकवर्ड वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी का काम करते हुए, शाक्य, मौर्य, लोध, यादव, गुर्जर और जाट नेताओं को आगे किया। प्रदेश बीजेपी की कमान केशव प्रसाद मौर्य को सौंपी तो वहीं पश्चिमी यूपी में संजीव बालियान, हुकुम सिंह जैसे नेताओं को पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का काम सौंपा। स्वामी प्रसाद मौर्य, उमा भारती, केशव प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं के चलते पिछड़े वर्ग का बड़ा वोट बैंक सपा के हिस्से से खिसक कर बीजेपी को गया।  


6) अखिलेश के लिए मुसीबत बना बिजली और गधा- यूपी के सियासी दंगल में जो दांव मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए उल्टा पड़ा वो था चुनाव प्रचार के दौरान बिजली का मुद्दा। अखिलेश यादव ने सूबे में चुनाव प्रचार के दौरान बिजली का मुद्दा उठाया और प्रदेश में लोगों को 24 घंटे तक बिजली देने का दावा किया। लेकिन, यही मुद्दा उनके लिए गले की हड्डी बन गया। विरोधी दलों और खासकर बीजेपी ने इस मु्दे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। पीएम मोदी ने एक रैली में संबोधन के दौरान राहुल गांधी के उस बयान तक का जिक्र कर दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि यूपी में खंभों पर तार तो हैं लेकिन उनमें बिजली नहीं है। इसके साथ ही गधे का मुद्दा भी अखिलेश के लिए इस चुनाव में हार का कारण साबित हुआ।


7) मायावती की सोशल इंजीनियरिंग फेल- बीजेपी अगर यूपी में सबसे आगे दिख रही है तो मायावती फैक्टर भी इसमें बड़ा कारण है। जिस दलित वोट को लेकर मायावती की पूरी राजनीति टिकी है बीजेपी उसमें सेंध लगाने में सफल रही। इस चुनाव में मायावती बिना किसी सोशल इजीनियरिंग के उतरीं थी। 2007 के चुनाव में मायावती ने ब्राह्मण और दलित जातियों के गठजोड़ को साधा था और इस समीकरण को लेकर अपने बूते बहुमत हासिल किया था लेकिन इस बात कहानी दोहराई नहीं जा सकी। बीजेपी ने दलितों को अपने पाले में करने के लिए भोज, यात्राएं जैसे कार्यक्रम रखे, जिसका बीजेपी को चुनावों में सीधा असर दिख रहा है।


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