दवाओं की कीमतों को काबू करने में लगी मोदी सरकार

बिजनेस | Oct. 17, 2017, 12:19 p.m.


नई दिल्ली (17 अक्टूबर):
देश में आम आदमी को राहत पहुंचाने के लिए मोदी सरकार महंगी दवाओं के दामों को काबू में करने के लिए प्रस्तावित बदलाव करके नॉन-शेड्यूल्ड ड्रग्स को प्राइस कंट्रोल के तहत लाने की तैयारी में है।

नेशनल फार्मासूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) और फार्मासूटिकल डिपार्टमेंट के प्रतिनिधियों ने जो प्रस्ताव बनाया है, उसमें नॉन-शेड्यूल्ड ड्रग्स को प्राइस कंट्रोल में लाने के अलावा आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची में कीमत तय करने की मौजूदा प्रणाली को बदलने का सुझाव भी दिया गया है। सुझाव में कहा गया है कि सभी ब्रैंड्स और जेनरिक दवाओं के साधारण औसत को ध्यान में रखते हुए एक पर्सेंट से ज्यादा बाजार हिस्सेदारी वाले ब्रैंड्स का साधारण औसत लिया जाए।

हालांकि दवा कंपनियों का कहना है कि अगर ऐसा कर दिया गया तो इंडस्ट्री की ग्रोथ को चोट पहुंचेगी और बाजार में प्रतिस्पर्द्धा के माहौल को नुकसान होगा। जो दवाएं कीमत नियंत्रण प्रणाली के दायरे से बाहर होती हैं, उन्हें नॉन-शेड्यूल्ड ड्रग्स कहा जाता है। अभी प्राइस कंट्रोल के तहत लगभग 370 दवाएं हैं।

मौजूदा प्रावधानों के मुताबिक, जिन कंपनियों ने 2013 के पहले कॉम्बिनेशन ड्रग्स (ये दवाएं आवश्यक सूची में हो सकता है कि न हों) लॉन्च की थीं, वे प्राइस कंट्रोल के बाहर रहेंगी और जो कंपनी नई दवा लॉन्च करना चाहेगी, उसे ड्रग रेग्युलेटर के पास आवेदन करना होगा। ड्रग रेग्युलेटर रीटेल प्राइस तय करता है।

मौजूदा प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर कोई कंपनी ऐसी दवा लॉन्च कर रही हो, जो एक शेड्यूल्ड और एक नॉन-शेड्यूल्ड ड्रग का कॉम्बिनेशन हो सकती हो तो रेग्युलेटर उस दवा की कीमत तय करेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि जिन कंपनियों ने 2013 के पहले इसी तरह की दवाएं बाजार में उतारी होंगी, उन्हें करंट सीलिंग प्राइस का पालन करना ही होगा। नए बदलाव के तहत सीलिंग प्राइस की गणना उस मैन्युफैक्चरर की ओर से अप्लाई किए गए प्राइस के आधार पर होगी, जो नई दवा के लिए सबसे पहले मंजूरी मांगेगी। पेटेंटेड दवाओं पर यह फॉर्मूला लागू नहीं होगा।

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