इतिहास के पन्नों से: जब लोकतंत्र की रक्षा करने की बजाय केंद्र के प्रहरी बने राज्यपाल



नई दिल्ली (17 मई): 
कर्नाटक के राज्यपाल ने भले ही बीजेपी के पूर्ण बहुमत नहीं होने के बाद येदियुरप्पा को सीएम पद की शपथ दिला दी हो। लेकिन ऐसा नहीं है कि यह देश में पहली बार हुआ है। इससे पहले भी देश में त्रिशंकु विधानसभा होने की स्थिति में राज्यपाल लोकतंत्र के रक्षक बनने के बजाय केंद्र में सत्तारूढ़ दल के प्रहरी की भूमिका निभाते हुए दिखे हैं।

कर्नाटक में जो भी हुआ है, उसे भले ही कांग्रेस संविधान का खून होने की बात कह रही हो लेकिन इससे पहले भी देश के इतिहास में राजनैतिक दलों ने मर्यादा को ताक पर रखते हुए सरकार बनाई है। बिहार, यूपी, हरियाणा सहित देश के अलग-अलग राज्यों में ऐसा होता रहा है।

जब राज्यपाल ने दिला दी कांग्रेस के भजनलाल को शपथ
1982 में हरियाणा की 90 सदस्यों वाली विधानसभा के चुनाव हुए थे और नतीजे त्रिशंकु आए। कांग्रेस-आई को 35 सीटें मिलीं और लोकदल को 31 सीटें। छह सीटें लोकदल की सहयोगी भाजपा को मिलीं। राज्य में सरकार बनाने की दावेदारी दोनों ही दलों ने रख दी। कांग्रेस के भजनलाल और लोकदल की तरफ से देवीलाल, लेकिन राज्यपाल गणपति देव तपासे ने कांग्रेस के भजनलाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी।

जब राज्यपाल ने बहुमत हासिल कर चुकी सरकार को किया था बर्खास्त
1983 से 1984 के बीच आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहे ठाकुर रामलाल ने बहुमत हासिल कर चुकी एनटी रामाराव की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। उन्होंने सरकार के वित्त मंत्री एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया। बाद में राष्ट्रपति के दखल से ही एनटी रामाराव आंध्र की सत्ता दोबारा हासिल कर पाए थे। तत्कालीन केंद्र सरकार को शंकर दयाल शर्मा को राज्यपाल बनाना पड़ा।

कर्नाटक में राज्यपाल पहले भी कर चुके हैं ऐसा

80 के दशक में कर्नाटक के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने जनता पार्टी के एसआर बोम्मई की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। बोम्मई ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। फैसला बोम्मई के पक्ष में हुआ और उन्होंने फिर से वहां सरकार बनाई। इसी तरह कर्नाटक में राज्यपाल के हस्तक्षेप का एक मामला 2009 में देखने को मिला था।

राज्यपाल हंसराज भारद्वाज 2009 में बीएस येदियुरप्पा वाली तत्कालीन भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया था। राज्यपाल ने सरकार पर विधानसभा में गलत तरीके से बहुमत हासिल करने का आरोप लगाया और उसे दोबारा साबित करने को कहा था।

1998 में कल्याण सिंह सरकार को किया गया था बर्खास्त
उत्तर प्रदेश में भी 1998 में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को असंवैधानिक करार दिया। जगदंबिका पाल दो दिनों तक ही मुख्यमंत्री रह पाए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

बिहार में भी राज्यपाल भंग कर चुके हैं विधानसभा
बिहार में 22 मई, 2005 की मध्यरात्रि को राज्यपाल बूटा सिंह ने विधानसभा भंग कर दी। तब किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं प्राप्त हुआ था। बूटा सिंह ने तब राज्य में लोकतंत्र की रक्षा करने और विधायकों की खरीद फरोख्त रोकने की बात कहकर विधानसभा भंग करने का फैसला किया था, लेकिन इसके खिलाफ दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बूटा सिंह के फैसले को असंवैधानिक बताया था।

- 1959 में केरल में ईएमएस नंबूदिरीपाद के नेतृत्व वाली बहुमत की सरकार को कांग्रेस नीत केंद्र सरकार द्वारा राज्यपाल की सिफारिश पर भंग किया गया था।
- 1967 में विपक्षी सरकारों को राज्यपाल द्वारा भंग कराया गया था।
- 1977 में जनता पार्टी की मोरारजी सरकार द्वारा कांग्रेस की राज्य सरकारों को राज्यपालों को मोहरा बनाकर भंग कराया गया था।
- 1980 में कांग्रेस की इंदिरा सरकार ने जनता पार्टी की राज्य सरकारों को भंग कर दिया था।