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आजादी के 70 सालों में खेलों में ऐसा रहा भारत का जलवा


नई दिल्ली (11 अगस्त): देश को आजाद हुए 70 साल होने जा रहे हैं। ऐसे में भारत में बहुत से क्षेत्रों में ऐसा काम किया है, जिसकी जितनी भी सराहना की जाए वह कम है। ऐसा की कुछ खेल जगत में भी भारतीय खिलाड़‍ियों में किया। भारत ने क्रिकेट में नई इबारत लिखी। इसमें सबसे अहम बात य‍ह थी कि क्रिकेट में भारत ने उन्हीं अंग्रेजों को इंग्लैंड की धरती पर पहली बार मात दी, जिन्होंने हमपर 300 साल तक शासन किया।

आज़ादी के बाद खेल जगत में भारत में ऐसा डंका बजाया, जिसका दुनिया ने लोहा माना। भारत ने पहली बार 1948 के लंदन ओलंपिक खेलों में एक आज़ाद देश के रूप में हिस्सा लिया। लंदन के वेम्बली स्टेडियम में तिरंगा लहराया गया और सोने पर सुहागा तो तब हुआ जब भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता और 'जन-गण-मन' की धुन पूरे स्टेडियम में गूँज उठी।

- केडी जाधव का नाम शायद आज की पीढ़ी भूल चुकी, लेकिन महाराष्ट्र के इस पहलवान ने ही 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक खेलों में भारत को पहला व्यक्तिगत पदक दिलाया था।
- ‘फ़लाइंग सिख’ के नाम से ख़्याति प्राप्त मिल्खा सिंह रोम में पदक से बेशक चूक गए, लेकिन उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में तो लिखा ही जाएगा।
- मेहनत और अनुशासन का एक उदाहरण लिएंडर पेस हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के नाम से मशहूर पेस और महेश भूपति की जोड़ी ने न जाने कितने ख़िताब जीत कर भारत का नाम ऊँचा किया है।

हॉकी में सोने की चमक
- भारतीय हॉकी टीम आजादी से पहले ही परचम लहरा चुकी थी। आजादी से पहले ही ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने 'गोल्डन' हैट्रिक मारी थी। आजादी के बाद भी भारतीय हॉकी ने लगातार तीन ओलंपिक खेलों में गोल्ड मेडल जीते। 1960 में रोम ओलंपिक में भारत खाते में सिल्वर आया लेकिन 1964 में उसने फिर से 'सोने' का गोल दागा। इसके बाद 1980 में भारत ने गोल्ड मेडल जीता। इस तरह से भारतीय हॉकी खिलाड़ियों ने पांच बार खेलों के महाकुंभ में सोने का तमगा जीता।

विदेशी धरती पर पहली टेस्ट सीरीज जीत
- 1971 में टीम इंडिया ने इंग्लैंड में पहली टेस्ट सीरीज जीती थी। अजीत वाडेकर की कप्तानी में भारतीय टीम ने उन्हीं अंग्रेजों को 1-0 से हराया जिन्होंने हमपर 300 साल राज किया। इस टीम में भगवत चंद्रशेखर, दिलीप सरदेसाई, वेंकटराघवन, गुंडप्पा विश्वनाथ, बिशन सिंह बेदी, फारुख इंजीनियर और सुनील गावस्कर जैसे खिलाड़ी शामिल थे। यह भारतीय क्रिकेट के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत भी थी।

1983 में कपिल की टीम ने रचा इतिहास
- कपिल देव की कप्तानी में टीम इंडिया ने 1983 में क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता। भारतीय टीम ने वेस्टइंडीज को हराकर वर्ल्ड कप जीता। 183 रनों के मामूली स्कोर को डिफेंड करते हुए कपिल देव की इस टीम ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था।

2007 में टी-20 वर्ल्ड कप में मिली जीत
- टीम इंडिया ने 2007 वर्ल्ड कप में शर्मनाक प्रदर्शन किया था और टीम नॉकआउट तक नहीं पहुंच पाई थी। फिर 2007 में टी-20 वर्ल्ड कप में टीम की कमान महेंद्र सिंह धोनी को सौंपी गई। टी-20 वर्ल्ड कप का यह पहला टूर्नामेंट था। यंग टीम इंडिया ने सबको चौंकाते हुए वर्ल्ड कप पर कब्जा जमाया था। फाइनल में टीम इंडिया ने पाकिस्तान को हराया था। आखिरी मौके पर जोगिंदर शर्मा ने मिसबाह उल हक को आउट कर मैच का पासा पलट दिया था।

टेस्ट में बने 'बेस्ट'
- टीम इंडिया के कैप्टन कूल ने वनडे और टी-20 में अपनी कप्तानी का लोहा तो मनवाया ही साथ ही टेस्ट में भी टीम को टॉप तक लेकर गए। धोनी की कप्तानी में टीम दिसंबर 2009 में टेस्ट में टॉप टीम बन गई थी। धोनी को तब आईसीसी गदा दिया गया था।

2011 वर्ल्ड कप में 'छक्का'
- वर्ल्ड कप 2011 का फाइनल मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में खेला गया। टीम इंडिया के सामने श्रीलंका की मुश्किल चुनौती थी। धोनी की कप्तानी में भारत ने श्रीलंका को हराकर वर्ल्ड चैंपियन बन गया था। इस मैच में कप्तान धोनी ने खुद को बल्लेबाजी ऑर्डर में ऊपर उतारा और जीत में अहम भूमिका निभाई। धोनी ने छक्के की गूंज आज भी देशवासियों के काम में ताजा है।

तेंदुलकर के सैंकड़ों की सेंचुरी
- मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान कहा जाता है। उनके नाम इंटरनेशनल क्रिकेट के तमाम रिकॉर्ड्स दर्ज हैं, लेकिन उनके एक रिकॉर्ड का इंतजार पूरे देश ने बड़ी शिद्दत से किया था। तेंदुलकर ने इंटरनेशनल क्रिकेट में सेंचुरी की सेंचुरी ठोकी है। 16 मार्च 2012 को तेंदुलकर के बल्ले से 100वां सैंकड़ा निकला था।

नारी शक्ति
- इन खेलों ने एक चिंगारी ज़रूर प्रज्जवलित की जो 1984 के लॉस एंजेल्स ओलंपिक खेलों में पीटी ऊषा के नाम से हर भारतीय के दिल में जलन छोड़ गई और फिर शुरू हुआ दौर महिला शक्ति का।
- ऊषा के बाद शाइनी विल्सन, वंदना राव, अंजलि वेदपाठक, कोनेरू हम्पी, अपर्णा पोपट, एमसी मेरीकॉम, कुंजरानी देवी और न जाने कितनी ऐसी लड़कियां हैं जो देश-विदेश में इस भारतीय महिला शक्ति का झंडा गाड़ चुकी हैं। इसी शक्ति को बख़ूबी आगे लाने वालों में आज नाम है सानिया मिर्ज़ा और अंजू बॉबी जॉर्ज का।

ओलंपिक में मलेश्वरी का मैजिक
- वेटलिफ्टर कर्णम मलेश्वरी पहली ऐसी महिला एथलीट थीं, जिन्होंने ओलंपिक में मेडल जीता। 2000 सिडनी ओलंपिक में कर्णम मलेश्वरी ने कांसे का तमगा जीता। उन्होंने 69 किलो वर्ग में यह उपलब्धि हासिल की। 9 साल तक कर्णम मलेश्वरी नेशनल चैंपियन रहीं। उन्हें आंध्र प्रदेश की आयरन गर्ल भी कहा गया। 1994-94 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया और 1995-96 में उन्हें खेल रत्न से नवाजा गया।

राज्यवर्धन सिंह राठौर की 'चांदी ही चांदी'
- राज्यवर्धन सिंह राठौर ने ओलंपिक में पहला व्यक्तिगत सिल्वर मेडल जीता था। उन्होंने मेंस डबल ट्रैप में यह उपलब्धि हासिल की। 2004 में एथेंस में हुए ओलंपिक में उन्होंने देशवासियों को यह खास तोहफा दिया था। एथेंस ओलंपिक के बाद भारत में खेलों को लेकर जागरुकता बढ़ी थी।

अभिनव बिंद्रा का 'गोल्डन' शॉट
- बीजिंग में हुए 2008 ओलंपिक खेलों में अभिनव बिंद्रा ने सोने का तमगा जीत इतिहास रच डाला था। भारतीय खेल जगत में यह ओलंपिक में पहला व्यक्तिगत गोल्ड मेडल था। बिंद्रा ने 10 मीटर एयर राइफल में यह गोल्ड जीता था।

इंडियन एक्सप्रेस' पेस-भूपति की जोड़ी
- 1996 से 2002 तक भारतीय टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी ने धमाल मचाया। 1999 में इन दोनों ने मिलकर विंबलडन और फ्रेंच ओपन में खिताब जीता। इस तरह से यह भारत की पहली ऐसी जोड़ी थी जिसने टेनिस में ग्रैंड स्लैम खिताब जीता था। 2002 और 2006 एशियन खेलों में इस जोड़ी ने गोल्ड मेडल जीता था।

पीवी संधू और साक्षी मलिक
- रियो ओलंपिक में एक बार फिर भारत की बेटियों ने भारतीय तिरंगा लहाराया। साक्षी मलिक ने पहलवानी में ब्राउंज मेडल पर कब्जा जबकि पीवी संधू ने बैडमिटन में सिल्वर मेडल कब्जाया।

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