'आप' के 20 विधायक अयोग्य करार दिए जाने के बाद केजरीवाल के सामने पांच का 'चक्रव्यूह'

देश | Jan. 21, 2018, 10:04 p.m.

नई दिल्ली (21 जनवरी): आम आदमी पार्टी का दावा है कि उसके 20 विधायकों ने संसदीय सचिव के पद पर रहते हुए एक पाई का वेतन नहीं लिया और ना ही दूसरी सुविधाएं ली इसलिए उनकी सदस्यता रद्द नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन जिस याचिकाकर्ता की शिकायत पर इतना बड़ा फैसला हुआ उनका दावा है कि केजरीवाल सरकार ने कानून को ताक पर रखा था। इस मामले में कुल 21 विधायकों पर आरोप लगे थे, जिसमें से 1 विधायक जरनैल सिंह ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

बड़ी बात ये है कि केजरीवाल सरकार के ऊपर फिलहाल कोई संकट नहीं है क्योंकि 20 विधायकों की सदस्यता खत्म होने के बावजूद 70  सदस्यों वाली विधानसभा में उनके पास 46 विधायक रहेंगे, बावजूद इसके केजरीवाल के सामने नई चुनौतियां खड़ी होती दिख रही हैं। 

पहली चुनौती- 20 सीटों पर उपचुनाव का सामना
20 विधायकों की सदस्यता रद्द होने के बाद अब दिल्ली में उपचुनाव कराने होंगे। अगर 20 सीटों पर उपचुनाव होता है। तो फिर बीजेपी और कांग्रेस को अपनी स्थिति मजबूत करने का बड़ा मौका मिल सकता है। 2015 की तरह सभी 20 सीटों पर चुनाव हासिल करना बड़ी चुनौती होगी। पिछले साल एमसीडी चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत के बाद आप की राह इतनी आसान शायद ही हो।


दूसरी चुनौती- 16 विधायकों पर नई तलवार
चुनाव आयोग के सामने आम आदमी पार्टी के 27 विधायकों की सदस्यता रद्द करने से जुड़ी एक और याचिका लंबित है। इसमें विधायकों को सरकारी अस्पतालों  की रोगी कल्याण समिति का अध्यक्ष बनाए जाने को दोहरे लाभ के पर नियुक्ति का मामला बताया गया है। इन 27 विधायकों में 11 विधायक ऐसे हैं जिनकी सदस्यता जा चुकी है तो वहीं 16 ऐसे विधायक हैं जिन पर नए सिरे से तलवार लटक सकती है। अगर चुनाव आयोग ने आरोपों को सही माना तो केजरीवाल की मुश्किलें कई गुना बढ़ सकती हैं। 


तीसरी चुनौती- इमेज कैसे बचाएंगे ?
ये साबित हो चुका है कि केजरीवाल ने नियमों को ताक पर रखकर संसदीय सचिव की नियुक्ति की। पूरे मामले से ये भी साफ है कि सरकार ने विधायकों को दोहरे लाभ के पद पर कायम रखने को लेकर तमाम कोशिशें की, लेकिन वो नाकाम रही। अब इस मुद्दे को उछालकर विरोधी केजरीवाल से उनकी नैतिकता पर जवाब मांगेंगे। ऐसे में केजरीवाल के सामने अपनी छवि पर आंच नहीं आने देने की चुनौती है। 


चौथी चुनौती- घर में उलझेंगे तो 8 राज्यों के चुनाव प्रचार से होंगे दूर
अगर उपचुनाव हुए तो केजरीवाल दिल्ली में अपने गढ़ को बचाने में इस कदर उलझ सकते हैं कि उनके लिए...दिल्ली से बाहर के बारे में सोचना मुश्किल हो सकता है। इस साल 4 बड़े  राज्यों के साथ ही कुल 8 राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इसमें केजरीवाल को बीजेपी और कांग्रेस को घेरने का बड़ा मौका नहीं मिल पाएगा। 


पांचवीं चुनौती- 2019 में मोदी को घेरने की मुहिम कमजोर पड़ेगी

केजरीवाल के लिए 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में..बीजेपी को घेरने के लिए वक्त निकालना मुश्किल हो सकता है। वो घर में इस कदर घिरे होंगे...कि बीजेपी विरोधी विपक्ष की मुहिम में आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है। ममता बनर्जी के साथ मिलकर पीएम मोदी के खिलाफ मजबूत विकल्प खड़ा करने की कोशिश खटाई में पड़ सकती है...क्योंकि 2020 में केजरीवाल को फिर दिल्ली में चुनाव का सामना करना है।

अब सबकी नजर केजरीवाल के अगले दांव पर है जिस पर आम आदमी पार्टी का पूरा दारोमदार टिका है। 

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